# Bol Pahadi > सरोकारों से जुड़े रहने की कोशिश... ## Posts - [गढ़वाल की वह रानी जिसने मुगलों की नाक काटी](https://bolpahadi.in/the-queen-of-garhwal-who-cut-off-the-nose-of-the-mughals/): भारतीय इतिहास में जब-जब “रानी कर्णावती” का नाम लिया जाता है, अधिकतर लोग मेवाड़ की उस रानी को याद करते हैं, जिसने मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजी थी। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि गढ़वाल की एक और रानी कर्णावती भी हुई थीं, जिन्होंने मुगल साम्राज्य की शक्ति को परास्त कर उसका घमंड चकनाचूर कर दिया था। यही रानी आगे चलकर “नाक कटी रानी” या “नाक काटने वाली रानी” के नाम से प्रसिद्ध हुईं। गढ़वाल की शेरदिल रानीसत्रहवीं शताब्दी के मध्य में गढ़वाल पंवार वंश के अधीन था। राजा महिपतिशाह के निधन के बाद उनके पुत्र पृथ्वीपतिशाह मात्र … - [त्रियुगीनारायण मंदिरः जहां हुआ था भगवान शिव-पार्वती विवाह](https://bolpahadi.in/triyuginarayan-temple-where-lord-shiva-and-parvati-were-married/): क्या आप जानते हैं कि हमारी पृथ्वी पर आज भी एक ऐसा पवित्र स्थान विद्यमान है जहां साक्षात भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था? यह स्थान उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले में स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर है। पौराणिक महत्त्वइस मंदिर के गर्भगृह में सदियों से अखण्ड अग्नि प्रज्वलित है। मान्यता है कि इसी अग्नि को साक्षी मानकर भगवान शिव और माता पार्वती ने विवाह किया था। यही कारण है कि इस स्थान को “त्रियुगी“ कहा जाता है, जिसका अर्थ है- वह अग्नि जो तीन युगों से निरंतर जल रही है। विवाह की अद्भुत कथापौराणिक मान्यता के अनुसार, त्रियुगीनारायण कभी … - [देहरादूनी बासमतीः एक सुगंधित विरासत की कहानी](https://bolpahadi.in/dehraduni-basmati-the-story-of-a-fragrant-heritage/): देहरादून, हिमालय की गोद में बसी वह घाटी, जहां की माटी और हवा में एक अनूठी मिठास और महक बस्ती है। यह वही भूमि है, जिसने विश्वविख्यात देहरादूनी बासमती को जन्म दिया। एक ऐसा चावल जिसकी सुगंध कभी गांवों की फिजाओं को महकाती थी और जिसकी ख्याति देश-दुनिया में गूंजती थी। लेकिन यह बासमती, जो आज भी अपने नाम से पहचानी जाती है मूलतः इस मिट्टी की नहीं थी। यह एक ऐसी कहानी है जो इतिहास, संस्कृति और प्रकृति के संगम से बुनी गई है। एक कहानी जो अफगानिस्तान के शासक दोस्त मोहम्मद खान बरकजई की निर्वासन यात्रा से शुरू … - [सतपुळी मोटर बोगिन खास... (गढ़वाली लोकगीत)](https://bolpahadi.in/satpuli-motor-bogin-khas-garhwali-folk-song/): द्वी हजार आठ भादौं का मास, सतपुळी मोटर बोगिन खास। से जावा भै-बन्दों अब रात ह्वेगे, रुण-झुण रुण-झुण बरखा लैगे। काल की सि डोर निन्दरा ऐगे, मोटर का छत पाणी भोरेगे।भादों का मैना रुण-झुण पाणी, हे पापी नयार क्य बात ठाणी। सबेर उठिक जब औन्दान भैर, बोगिक औन्दार सान्दण, खैर।डरैबर-कलैण्डर सबि कट्ठा ह्वावा, अपणि गाड़ी मां ढुंगा भोरा। गरि ह्वै जाली गाड़ी रुकि जालो पाणी, हे पापी नयार क्य बात ठाणी।अब तोड़ा जन्देउ कफड़यों खोला, हे राम, हे राम, हे शिब बोला। डरैबर-कलैण्डर सबि भेंटि जौला, ब्यखुनी बिटिन यखुली रौला।भग्यानु कि मोटर छाला लैगी, अभाग्यूं कि मोटर डुबण लैगी। शिवानन्दी … - [लोक के चितेरे ‘मोहन उप्रेती’ से जुड़े संस्मरण](https://bolpahadi.in/memories-related-to-the-famous-musician-mohan-upreti/): उस शाम मैं गुजर रहा था उद्दा की दुकान के सामने से, अचानक दुकान की सबेली में खड़े मोहन ने आवाज दी- ‘कहां जा रहा है ब्रजेन्द्र? यहां तो आ। क्या है यार? घूमने भी नहीं देगा। और मैं खीज कर उदेसिंह की दुकान के सामने उसके साथ घुस गया। उसके सामने ही लगी हुई लकड़ी की खुरदरी मेज थी। मोहन कुछ उत्तेजित-सा लग रहा था। मेज को तबला मानकर वह उसमें खटका लगाकर एक पूर्व प्रचलित कुमाउनी गीत को नितान्त नई धुन तथा द्रुत लय में गा रहा था। वह बार-बार एक ही बोल को दुहरा रहा था। उस … - [देहरादूनः गढ़वाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर का केंद्र](https://bolpahadi.in/dehradun-centre-of-historical-and-cultural-heritage-of-garhwal/): History of Dehradun : देहरादून, जो आज उत्तराखंड की राजधानी के रूप में जाना जाता है, अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वैभव के लिए विख्यात है। इसकी भूमि पर गढ़वाल के गढ़वालियों का लगभग एक सहस्राब्दी तक प्रभाव रहा, जिसने इस क्षेत्र को एक समृद्ध इतिहास और परंपरा का उपहार दिया। गढ़वाल का यह क्षेत्र कभी 52 गढ़ों का संगम था, जहां हर गढ़ अपने शौर्य और स्वाभिमान की कहानी कहता था। देहरादून की यह दूनघाटी न केवल प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है, बल्कि यहां की मिट्टी में बसी वीरता और सृजनशीलता की गाथाएं इसे और भी विशेष बनाती हैं। गढ़ … - [राजपूत राणावत मियां लोगों को मिली थी ‘मियांवाला’ की जागीर](https://bolpahadi.in/rajput-ranawat-miyan-people-got-the-estate-of-miyanwala/): देहरादून के मियांवाला जागीर का इतिहास गढ़वाल के राजाओं के शासनकाल से गहराई से जुड़ा हुआ है, जहां गुलेरिया समुदाय के साथ-साथ राणावत मियां वंश के लोगों का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। राणावत, जो मूलरूप से हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र में स्थित गुलेर रियासत से संबंधित थे, समय के साथ गढ़वाल की ओर प्रवास कर गए और यहीं स्थायी रूप से बस गए। गुलेर (हिमाचल) से अपनी रानी और रिश्तेदारों के साथ आए राणावत, गुलेरिया लोगों के साथ मिलकर गढ़वाल पहुंचे। गढ़वाल में बसने के बाद राणावतों ने न केवल अपनी पहचान बनाए रखी, बल्कि स्थानीय समाज और … - [इतिहासः ‘मियांवाला’ जो अब हो गया ‘रामजीवाला’](https://bolpahadi.in/history-miyanwala-which-has-now-become-ramjiwala/): History of Miyanwala Dehradun : हिमाचल प्रदेश के वर्तमान कांगड़ा जिले में कभी गुलेर रियासत का गौरवशाली इतिहास रहा था। यह रियासत न केवल अपने शासन और संस्कृति के लिए जानी जाती थी, बल्कि इसके गहरे संबंध उत्तराखंड की गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल रियासतों से भी थे। इतिहास के पन्नों में दर्ज है। गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल के लगभग 13 राजाओं के वैवाहिक और पारिवारिक रिश्ते हिमाचल प्रदेश की रियासतों, विशेष रूप से गुलेर से जुड़े हुए थे। इन रिश्तों ने दोनों क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक आदान-प्रदान को मजबूत किया। गढ़वाल के इतिहास में सबसे लंबे समय लगभग … - [209 वर्ष पहले बसा था ऐतिहासिक टिहरी शहर](https://bolpahadi.in/historic-tehri-city-was-settled-209-years-ago/): ऐतिहासिक व सांस्कृतिक टिहरी शहर का डूबना इसके कई नागरिकों के लिए एक विनाशकारी घटना थी। कुछ लोगों के लिए, यह एक बड़े भाई को खोने जैसा था – एक गहरी और गहरा क्षति जिससे उन्हें खालीपन और दिल टूटा हुआ महसूस हुआ। इन व्यक्तियों का अपने शहर से गहरा प्रेम और जुड़ाव था, वे यहीं पैदा हुए और पले-बढ़े थे, उनके परिवार की कई पीढ़ियों ने इसे अपना घर कहा था। टिहरी का डूबना सिर्फ एक भौतिक स्थान का नुकसान नहीं था, बल्कि सदियों की यादों, परंपराओं और जीवन शैली का मिटना था। शहर का डूबना भारतीय इतिहास में … - [देवलगढ़ः तत्कालीन गढ़वाल साम्राज्य की पसंदीदा जगह](https://bolpahadi.in/devalgarh-the-favorite-place-of-the-then-garhwal-kingdom/): उत्तराखंड के श्रीनगर गढ़वाल से 17 किमी दूर पहाड़ी पर बसा देवलगढ़, ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है। खासकर 16वीं शताब्दी की शुरुआत में गढ़वाल साम्राज्य की पूर्व राजधानी के रूप में। राजा अजय पाल द्वारा 1512 में चांदपुर गढ़ी से देवलगढ़ में राजधानी स्थानांतरित करने के महत्वपूर्ण निर्णय ने देवलगढ़ के इतिहास में एक परिवर्तनकारी अवधि को चिह्नित किया। इस स्थानांतरण ने देवलगढ़ को सन् 1517 तक राज्य के प्रशासनिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में फलता- फूलता देखा, जब राजधानी को श्रीनगर ले जाया गया। राजधानी के रूप में अपना दर्जा खोने के बावजूद, देवलगढ़ शाही परिवार के लिए … - [हर किसी को आकर्षित करता है आदि बद्री मंदिर का वास्तु शिल्प](https://bolpahadi.in/uttarakhand-the-architectural-craft-of-adi-badri-temple-attracts-everyone/): दर्शन के अनुभव को बढ़ाने और मंदिर के महत्व को सम्मान देने के लिए यह जरूरी है कि आदि बद्री मंदिर के आसपास जगह बनाई जाए। इस तरह की पहल से न केवल मंदिर की वास्तुकला की अधिक दृश्य सराहना की जा सकेगी, बल्कि ऐसा वातावरण भी तैयार होगा जो इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है। मंदिर के आसपास एक व्यापक क्षेत्र को डिजाइन करके, आगंतुकों को इस स्थल के पुरातात्विक मूल्य को भव्य तरीके से सराहने का अवसर मिलेगा, जिससे यह सांस्कृतिक विरासत के साथ एक गहरा संबंध विकसित करेगा। उत्तराखंड के सुरम्य चमोली जिले में स्थित … - [हीरा सिंह राणा के गीतों में पहाड़, प्रकृति और मानवीय पक्ष](https://bolpahadi.in/mountains-nature-and-human-side-in-the-songs-of-heera-singh-rana/): Folk singer Heera Singh Rana : हीरा सिंह राणा उत्तराखंड लोक संगीत के महान संवाहक व रक्षक रहे हैं। उनके रचे गीतों में तरह तरह के भाव, रस, प्रतीक, विम्बों का प्रयोग हुआ। जो उन्हें आधुनिक संगीत संसार में एक महान गीत रचयिता और गायक की श्रेणी में रखने को काफी हैं। 16 सितंबर, 1942 को डंढ़ोली गांव (मनिला) अल्मोड़ा में जन्मे लोक कवि हीरा सिंह राणा का प्रारंभिक जीवन-संघर्ष दिल्ली और कोलकता में रहा। प्रवास से मन हटा तो वापस पहाड़ आकर लोक कलाकार बन गए। धीरे-धीरे आकाशवाणी और दूरदर्शन के बाद देश-विदेश में अपनी पहचान बनाई। हीरा सिंह … - [नरेंद्र सिंह नेगी ने की गढ़वाली शोध पुस्तक लोकार्पित](https://bolpahadi.in/garhratna-narendra-singh-negi-inaugurated-garhwali-research-book/): • साहित्यकार मदन डुकलान के रचनाकर्म पर है आशा ममगाईं की यह किताबगढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी ने साहित्यकार मदन डुकलान के साहित्य पर आधारित शोध पुस्तक ‘मदन मोहन डुकलान कु काव्य वैशिष्ट्य अर दर्शन’ का लोकार्पण किया। गढ़वाली भाषा-साहित्य की अध्येता और शोधार्थी आशा ममगाईं की यह किताब उनके द्वारा ‘गढ़वाली भाषा अर संस्कृति’ विषय पर एमए के दौरान किए गए लघु शोध पर आधारित है। उत्तरकाशी कलेक्ट्रेट ऑडिटोरियम में आयोजित लोकार्पण और कवि गोष्ठी का शुभारंभ मांगल गीत के साथ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। लोकार्पण के बाद युवा कवि आशीष सुंदरियाल ने पुस्तक का परिचय दिया। कहा कि … - [मेडिकल टूरिज़्म में मड थेरेपी की जरूरत](https://bolpahadi.in/need-for-mud-therapy-in-medical-tourism/): भारत मेडिकल टूरिज्म में कई सकारात्मक तत्वों के कारण प्रगति कर रहा है। मेडिकल टूरिज्म में प्राकृतिक चिकित्सा का योगदान भी अब वृद्धि पर है, जैसे केरल व उत्तराखंड। प्राकृतिक चिकित्सा पर्यटन विकास में मृदा चिकित्सा या मड थेरेपी टूरिज्म का महत्वपूर्ण योगदान है। मृदा चिकित्सा पर्यटन के विकास के लिए कई बातों पर ध्यान देना होगा। वैकल्पिक पर्यटन अथवा प्राकृतिक चिकित्सा पर्यटन विकास में मृदा अथवा मड चिकित्सा सुविधा आवश्यक है। मृदा चिकित्सा में मिट्टी मुख्य माध्यम होता है। मृदा चिकित्सा के तरीकेमृदा लेप : जिसमे मुंह या विशेष अंग पर औषधि मिश्रित या केवल मिट्टी का लेप किया … - [उत्तराखंड के अब तक के मुख्यमंत्रियों के नाम](https://bolpahadi.in/names-of-chief-ministers-of-uttarakhand-till-now/): उत्तराखंड राज्य गठन को 23 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इन 23 वर्षो में राज्य में अंतरिम सरकार से अब तक 10 मुख्यमंत्री बने। राज्य में वर्ष 2016 में दो बार राष्ट्रपति शासन भी लगा। अब के मुख्यमंत्रियों में भुवन चंद्र खंडूरी और पुष्कर सिंह धामी दो-बार तो हरीश रावत तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। राज्य के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी अंतरिम सरकार के मुखिया रहे। जबकि पहली निर्वाचित सरकार के मुखिया का पदभार नारायण दत्त तिवारी के पास रहा। राज्य में वर्ष 2002 से 2022 तक 2002 2007 2012 2017 और 2022) पांच विधानसभा चुनाव हो चुके … - [उत्तराखंड के हर विषय पर लिखते हैं भीष्म कुकरेती](https://bolpahadi.in/bhishma-kukreti-has-been-writing-on-every-topic-of-uttarakhand/): • प्रशांत मैठाणी अनादि काल से ही गढ़वाल की भूमि ज्ञानियों, विद्वानों और वीरों की जन्मभूमि और कर्मभूमि रही है। इन भागों में हर विधा के सिद्ध हस्त जन्म ले चुके हैं। स्कंदपुराण में इसे केदार खंड के रूप में वर्णित किया गया है। कालांतर में इस मध्य भाग को गढ़वाल के नाम से जाना जाने लगा। लघु हिमालय के यह भाग प्रशासनिक रूप से ब्रिटिश काल के दौरान ढांगू पट्टी के नाम से जाना जाता था, भौगोलिक रूप से यह क्षेत्र दक्षिण पश्चिमी गढ़वाल में आता है। ढांगू पट्टी को तल्ला, मल्ला और बिछला तीन भागों में बांटा गया … - [नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों की इंद्रधनुषी छटा](https://bolpahadi.in/book-review-rainbow-of-songs-by-narendra-singh-negi/): • दिनेश शास्त्रीउत्तराखंड के प्रख्यात लोकगायक, कवि, दार्शनिक और संगीतकार नरेंद्र सिंह नेगी ने अपने विभिन्न गीत संग्रह यथा- तेरी खुद तेरो ख्याल, तुम दगड़ी ये गीत राला, अब जबकि, गाण्यूं की गंगा स्याण्यूं का समोदर, मुट्ट बोटिक रख और खुचकंडी में उत्तराखंड के लोकजीवन के सभी पहलुओं को समाज के सामने परोसा। अपने जीवन की ढाई बीसी यानी पूरे पांच दशक अपनी धरती के गीत संगीत को समर्पित करने वाले कालजयी रचनाकार उत्तराखंड के गौरव नरेंद्र सिंह नेगी की उक्त पुस्तकों में से चुनिंदा एक सौ एक (एक तरह से शगुन) रचनाओं का भाष्य पांडित्यपूर्ण ढंग से वरिष्ठ आईएएस … - [व्यंग्य : एक आम हैंका आमाऽ काम नि औंदु](https://bolpahadi.in/satire-ek-aam-hainka-aamaa-kaam-ni-aundu/): Satire: Ek aam hainka aamaa kaam ni aundu• नरेंद्र कठैतवुन त आम क्वी बड़ी चीज नी। आम, आम होंदु। आमौ सबसि नजीकौ रिस्तादार बि – आम हि होंदु। आमै किस्मत मा सुरु बिटि आखिर तक – तड़तुड़ौ घाम हि रौंदु। बकि आमाऽ ओर-पोर खास क्वी नि होंदु। जु वेका जरा फुंडै च अर कुछ दैण लैक च वु -चड़ाचोटौ घाम होंदु। घाम आमाऽ ऐंच जथगा तड़तुड़ौ रौंदु आम दुन्यो तैं उथगी पकणू रौंदु। लोक्खू तैं मिट्ठु होणा खातिर आम तैं अन्ध्यरा कूणा पाळ मा -कत्ति दिन तक प्वड़युं रौण प्वड़दु। फिर्बि झणि किलै, एक आम हैंका आमाऽ काम नि औंदु। … - [लोक के सांस्कृतिक आलोक के पर्याय डीआर](https://bolpahadi.in/book-raiviaiw-sanskrti-aur-rangamanch-ke-purodha-dr-purohit/): • बीना बेंजवालहिमालयी राज्य उत्तराखंड में लोकनाट्य एवं लोक संगीत की विरासत का संरक्षण करते हुए लोक की सांस्कृतिक समृद्धि को विश्व पटल तक पहुंचाने में डॉ. डी.आर. पुरोहित का अवदान अतुलनीय है। लोक के सांस्कृतिक आलोक के पर्याय डॉ. डी.आर. पुरोहित के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित है पुस्तक ’संस्कृति और रंगमंच के पुरोधा डॉ. डी.आर. पुरोहित’। चार दशक से पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय राष्ट्रीय सहारा से 2020 में समाचार सम्पादक पद से सेवानिवृत्त दिनेश सेमवाल शास्त्री द्वारा इस पुस्तक का सम्पादन किया गया है। उत्तराखंड की लोक संस्कृति के ध्वजवाहक एवं रंगमंच के पुरोधा डॉ. पुरोहित पर केन्द्रित … - [कानातालः प्रकृति प्रेमियों के लिए कुदरत का तोहफा](https://bolpahadi.in/kanatal-natures-unique-gift-for-nature-lovers/): • शीशपाल गुसाईंUttarakhand Tourist Destination : कानाताल, टिहरी गढ़वाल का एक अद्भुत और शांतिपूर्ण स्थान है। जिसे शब्दों में बयां करना वाकई कठिन है। इसकी प्राकृतिक सुंदरता और हरे-भरे जंगल मानो किसी स्वप्न की कल्पना हो। वहां के ऊंचे-ऊंचे बांज के पेड़ और उनके बीच बसाए गए छोटे-छोटे घर स्वर्ग की याद दिलाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस घने जंगल को स्थानीय लोगों ने ही संजीदगी से संभाला और संवारा है। यहां की साफ़-सुथरी हवा, सुरम्य दृश्य और हर तरफ हरियाली देखकर मन प्रसन्न हो उठता है। कुदरत का यह अद्भुत करिश्मा लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता है। … - [गढवाली भाषा में सत्य नारायण ब्रत कथा](https://bolpahadi.in/satya-narayan-brat-katha-in-garhwali-language/): भगवान सत्य नारायण जी की प्रेरणा से मिथैं भगवान सत्य देव की कथा कु पद्यानुवाद कनौ अंतनिर्हित आदेश ह्वै। अर वांकि हि परीणति च आपक समणि श्री हरि कथा कु यु टुट्यां फुट्यां शबदुं मा प्रस्तुत पद्यात्मक कथा समोदर।रचना – विवेकानदं जखमोला व्यास जी ब्वना छना- एक दौं नैमिषारण्य मा, बैठ्यां छ्या शौनकादी ऋषी।पुछणन श्री सूत जी से, भलि सि क्वी तप व्रत विधी।सूत जी ब्वलदिन त सूणा, तुम सबी विद्वत गुणी।यनि कुछ पूछणा छा हरि से, एक दौं नारद मुनी।भ्वगणा छन नर लोक मा दुःख,सूणा हे लक्ष्मी पती।भलु सी क्वी तप व्रत बथावा, पै सक्यां जु सि सदगती।शंख, चक्र, … - [इस गांव में आज भी निभाई जा रही मामा पौणा की परंपरा](https://bolpahadi.in/garhwal-the-tradition-of-mama-pauna-is-still-being-followed-in-this-village/): • शीशपाल गुसाईं Mama Pauna Tradition : सदियों से चली आ रही मामा पौणा (मामा मेहमान) की प्रथा नरेंद्रनगर ब्लॉक के दोगी पट्टी में आज भी जीवित है।  जो कि महान संस्कृति को जीवित रखती है। प्रथा के अनुसार भांजे की शादी में मामा को घोड़े में मेहमान के रूप में लड़की (वधु) के यहां ले जाया जाता है और उनके गले में मालाएं होती हैं जिससे वह विशेष मेहमान के दर्जे में आते हैं। लोकगीतों में भी मामा पौणा के बहुत सारे गीत सुनने को मिलते हैं। गढ़वाल क्षेत्र यह इलाका धन्य है जिन्होंने इस परंपरा को आज भी … - [गढ़वाली कहानीः छठों भै कठैत की हत्या!](https://bolpahadi.in/garhwali-story-murder-of-chhath-bhai-kathait/): प्रतीकात्मक चित्र • भीष्म कुकरेती /    हौर क्वी हूंद त डौरन वैक पराण सूकि जांद पण मेहरबान सिंग कठैत त राजघराना को संबंधी छौ राजा प्रदीप शाह को खासम ख़ास महामंत्री पुरिया नैथाणी सनै कौरिक खड़ो ह्व़े अर वैन कैदी मेहरबान सिंग कठैत तैं द्याख. फिर पुरिया नैथाणी न मेहरबान कठैत को तर्फां देखिक, घूरिक ब्वाल,“ओह! कठैत जी! जाणदवां छंवां तुम पर क्या अभियोग च?“ मेहरबान सिंग कठैत न जबाब दे,’पुरिया बामण जी! अभियोग? जु म्यार ब्वाडा क नौन्याळ पंचभया कठैत तुमर पाळीक बजीर मदन सिंग भंडारी, हमर बैणिक जंवैं भीम सिंग बर्त्वाल जन लोकुं ळीोंन दसौली ज़िना नि … - [समीक्षाः जीवन के चित्रों की कथा है ‘आवाज रोशनी है’](https://bolpahadi.in/review-awaaz-roshni-hai-is-a-story-of-lifes-pictures/): बचपन की स्मृतियां कभी पीछा नहीं छोड़तीं। कितना भी कहते रहो ’छाया मत छूना मन’ मन दौड़ता रहता है दादी, नानी, मामा, मां, पिताजी के पास। अमिता प्रकाश की कृति आवाज़ रोशनी है- जीवन के उस कालखंड की यादें हैं जहां ‘उस मीठी नींद में, नाना-नानी का प्यार दुलार है, मामा-मामी की केयर है, धौली गाय का स्नेह है, अज्जू, सूरी, गब्दू की छेड़खानियां हैं। गुर्रूजी की फटकार है, पानी के लिए लड़ते-झगड़ते अनेकों चेहरे हैं तो घास व लकड़ी की ’बिठकों’ के नीचे हंसती खिलखिलाती, किसी ‘बिसौण’ पर बतियाती या जेठ-बैसाख की दुपहरी में किसी सघन खड़िक या पीपल … - [कंडाळी (बिच्छू घास) के अनेकों फायदे](https://bolpahadi.in/many-benefits-of-kandali-nettle-grass/): – डॉ. बलबीर सिंह रावत कंडळी, (Urtica dioica), बिच्छू घास, सिस्नु, सोई, एक तिरस्कृत पौधा, जिसकी ज़िंदा रहने की शक्ति और जिद अति शक्तिशाली है. क्योंकि यह अपने में कई पौष्टिक तत्वों को जमा करने में सक्षम है. हर उस ठंडी आबोहवा में पैदा हो जाता है जहां थोडा बहुत नमी हमेशा रहती है. उत्तराखंड में इसकी बहुलता है और इसे मनुष्य भी खाते हैं. दुधारू पशुओं को भी इसके मुलायम तनों को गहथ, झंगोरा, कौणी, मकई, गेहूं, जौ, मंडुवे के आटे के साथ पका कर पींडा बना कर देते हैं। कन्डाळ में जस्ता, तांबा सिलिका, सेलेनियम, लौह, केल्सियम, पोटेसियम, … - [गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी की शब्दावली में विदेशी शब्द](https://bolpahadi.in/words-of-foreign-languages-in-the-vocabulary-of-garhwali-kumaoni-and-jaunsari/): संकलन- भीष्म कुकरेती अरबी और इरानी शब्द   अ- अक्षर से शब्द – अदब , अमरुद , अब्बल , असर , असल , अहम आ- अक्षर से शब्द – आइन्दा , आइना , आखिर , आखिरें, आदि, आदत , आदतन , आगाह , अजमाना , आजाद , आतिशबाजी , आदत , आदमी , आदाब , आदी, आफत , आबकारी , आबरू , आबला , आबाद , आम (कॉमन) , आमदनी , आरजू , आराम ,  आलम , आलम (नाम) , आलिशान , आवाज , आशिक , आसमान , आसमानी , आसार , आस्तीन , आहिस्ता   इ- अक्षर से शब्द  – … - [‘इमोशन’ की डोर से बंधी ‘खैरी का दिन’ (Garhwali Film)](https://bolpahadi.in/khairi-ka-din-tied-with-the-thread-of-emotion-garhwali-film-review/): भारतीय सिनेमा के हर दौर में सौतेले भाई के बलिदान की कहानियां रुपहले पर्दे पर अवतरित होती रही हैं। हालिया रिलीज गढ़वाली फीचर (Garhwali Feature Film) फिल्म ‘खैरी का दिन’ (Khairi Ka Din) का कथानक भी ऐसे ही एक तानेबाने पर बुनी गई है। जिसमें नायक से लेकर खलनायक तक हर कोई अपने हिस्से की ‘खैरि’ (दर्द) को पर्दे पर निभाता है, और क्लाईमेक्स में यही ‘खैरि’ दर्शकों को उनकी आंखें भिगोकर थियेटर से लौटाती है। माहेश्वरी फिल्मस (Maheshwari Films) के बैनर पर डीएस पंवार कृत और अशोक चौहान ‘आशु’ द्वारा निर्देशित फिल्म ‘खैरी का दिन’ एक देवस्थल पर नायक … - [जसपुर के बहुगुणाओं का ज्योतिष टीका साहित्य- 3](https://bolpahadi.in/garhwali-commentary-on-astrology-of-jaspurs-bahugunas-3/):   • भीष्म कुकरेती यह लेखक हिंदी टीकाओं से गढ़वाली शब्दों की खोज कर रहा था कि उसे कुछ पंक्तियों के बाद गढ़वाली पक्तियों की टीका भी मिली। याने की पहले हिंदी में टीका फिर गढ़वाली और फिर हिंदी में। इस भाग में भी ग्रहों की गणना करने की विधि और फलादेश की टीका है। गढ़वाली टीका का भाग इस प्रकार है – ।। भाषालिख्यते ।। प्रथम भूजबोल्याजांद ।। पैले २१२९  अंशतौ भुज होयु होयो जषते ३ राश होया तव ६ राशिमा घटाणो याने ६। ०। ०। ० । मा घटाणो ५ राश २९ अंश तक जषते फिर ६। ७। … - [जसपुर के बहुगुणाओं का गढ़वाली साहित्य में योगदान- 2](https://bolpahadi.in/contribution-of-bahugunas-of-jaspur-to-garhwali-commentary-literature-from-sanskrit-2/): • भीष्म कुकरेती     अन्य दो गढ़वाली में टीका के पृष्ठ जो मुझे प्राप्त हुए उनसे लगता है कि ये पृष्ठ किसी विषय के बीच के अंश हैं और उपरोक्त दो पृष्ठों के बाद के लिखे गए हैं। कारण है स्याही अभी भी ताज़ी हैं और लाल स्याही से बनाए गए दोनों ओर दो दो हाशिए हैं। प्रथम पृष्ठ में दाहिने हाशिए के अंदर वर्टिकली श्री गणेशाय नमः और सीधा गोरी लिखा है। नीचे साकलं और गोरी लिखा है।  इबारत इस प्रकार है – ग लेणो फिर शेष ३०  न भाग लेणो फिर शेष ६० न गुणणो टीवी ता को … - [जसपुर के बहुगुणाओं का गढ़वाली टीका साहित्य में योगदान](https://bolpahadi.in/contribution-of-bahugunas-of-jaspur-to-garhwali-tika-literature/): • भीष्म कुकरेती गढ़वाली साहित्यकार एवं इतिहासकार अबोध बंधु बहुगुणा ने ’गाड म्यटेकी गंगा’ पुस्तक में संस्कृत ज्योतिष व कर्मकांड साहित्य का गढ़वाली में टीका का उल्लेख किया है। अबोध बंधु ने 1925 का धोरा खोळा, कटळस्यूं निवासी पंडित रतनमणि घिल्डियाल द्वारा ज्योतिष गणित का गढ़वाली टीका (प्दजमतचतमजंजपवद) का जिक्र किया है (गाड म्यटेकी गंगा- पृष्ठ 59 )।  उसके बाद के गढ़वाली साहित्य इतिहासकारों ने इस दिशा में कोई खोजपूर्ण कार्य नही किया। मेरा मानना था कि सन् 1890 से पहले जब कोई स्कूल नही थे और हिंदी का कोई स्थान गढ़वाल में नही था तो कर्मकांडी पंडित अवश्य ही … - [माँ अब कुछ नहीं कहती - (हिंदी कविता)](https://bolpahadi.in/mother-doesnt-say-anything-now-hindi-poem/): माँअब कभी-कभीआती है सपनों मेंचुप रहती है,कुछ नहीं कहती माँसुनाती थी बातों-बातों मेंजीवन के कई हिस्सेसुने हुए कई किस्सेभोगे हुए यथार्थजिनके थे कुछ निहितार्थ माँआगाह करती थीलोगों से, बुरे दौर सेसलाह देती थीचारों तरफ देखने की माँडाँट देती अक्सर मुझेमेरी गलतियों परमेरी कमियों परमृत्यु के कुछ दिन पहलेआखिरी बार भी डाँटा था माँअब आती है सपनों मेंचुपचाप देखती हैशायद महसूस करती हैमेरा आज, मेरा कल मगर,माँ अब कुछ नहीं कहतीमाँ अब कुछ नहीं कहती - [अब....!](https://bolpahadi.in/now/): गिर्दा !आपने कहा थाहमारी हिम्मत बांधे रखने के लिए‘जैंता इक दिन त आलो ये दिन ये दुनि में’तब से हम भी इंतजार में हैंवो ‘दिन’ आने के हिम्मत हमने अब भी बांधी हुई हैउसी एक पंक्ति के भरोसेदिन हमारे आएंगे; नहीं मालूमहाँ, उन ब्योपारियों के आ गएजिनसे तुमने पूछा था‘बोल ब्योपारी अब क्या होगा..’ तुम्हारे चले जाने के दस साल/ औरउत्तराखंड राज्य बनने के बीस साल/ बादहमारे अंदर टूटते ‘पहाड़’ कोअब कौन थामे हुए रखेगा गिर्दा!कदाचित अब हमहिम्मत को बांध कर नहीं रख सकेतो कौन कहेगा फिर हमसे‘जैंता इक दिन त आलो ये दिन ये दुनि में’ गिर्दा!चले आओ फिर … - [साहित्यकारों के कमरों की कहानी 'मेरा कमरा'](https://bolpahadi.in/story-of-writers-rooms-mera-kamra/): प्रबोध उनियाल द्वारा संपादित ‘मेरा कमरा’ चालीस लेखकों के अपने अध्ययन कक्ष के संबन्ध में सुखद-दुःखद अनुभवों को समेटे पठनीय व संग्रहणीय कृति है।  पुस्तक में साहित्यकारों के अध्ययन कक्ष या आवासीय लेखन कक्ष का लेखा-जोखा अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। समकालीन और तत्कालीन जीवन शैली की विविध चुनौतियों, रचनाधर्मिता में उपस्थित होने वाली समस्याओं, अनेक विसंगतियों और कुछ सकारात्मक पक्षों पर प्रकाश डालने वाली यह कृति लेखकों के जीवन के अनछुए पक्षों को प्रस्तुत करती है। इसमें संगृहीत वरिष्ठ व नए लेखकों के लेखों का सार प्रस्तुत करते हुए हर्ष हो रहा है।  पुस्तक का पहला आलेख स्वयं सम्पादक प्रबोध उनियाल … - [अद्भुत थी चंद्रकुँवर बर्त्वाल की काव्य-दृष्टि](https://bolpahadi.in/the-poetic-vision-of-poet-chandrakunwar-bartwal-was-amazing/): • बीना बेंजवाल /  कैलासों पर उगे रैमासी के दिव्य फूलों को निहारने वाली कवि चंद्रकुँवर बर्त्वाल की काव्य-दृष्टि उस विराट सौंदर्य चेतना से संपन्न हो उन्हें रैमासी कविता का कवि बना गई। प्रकृति के इस सान्निध्य में ऋषियों जैसी सौम्यता लिए कवि स्वयं कहते हैं- मेरी आँखों में आए वे रैमासी के दिव्य फूल!  मैं भूल गया इस पृथ्वी को मैं अपने को ही भूल गया!  सम्मोहन की इस स्थिति में जागृत हुई उनकी काव्य चेतना! और ऐसी उच्च भावभूमि पर खिली कविता का परिवेश भी हिमालयी हो गया! फूलों के ऐसे देश चलकर घन छाया में नाचते मनोहर … - [प्रकृति का हमसफ़र छायाकार डॉ. मनोज रांगड़](https://bolpahadi.in/natures-companion-cinematographer-dr-manoj-rangad/): • प्रबोध उनियाल चेहरे में हमेशा मुस्कान, व्यवहार में बेहद आत्मीयता और प्रकृति को अपनी ही नजर से देखने का अंदाज अगर देखना हो तो एक बार आप जरूर डॉ. मनोज रांगड़ से मिल सकते हैं. यूँ तो तस्वीरें बोलती ही हैं लेकिन अगर ये मनोज रांगड़ के कैमरे से खींची हों तो रुकिए! ये तस्वीरें आपसे संवाद भी करेंगी. उनका कहना है कि फोटोग्राफी उनका पेशा नहीं, ये तो उनका जुनून है या कह लो कि सुकून भी. मनोज जी टीएसडीसी में प्रबंधक पर्यावरण के पद पर कार्यरत हैं. वही ओशो ध्यान केंद्र से भी जुड़े हैं. जहाँ वे … - [गढ़वाली भाषा के 'की-बोर्ड' हैं 'नरेन्द्र सिंह नेगी'](https://bolpahadi.in/narendra-singh-negi-is-the-keyboard-of-garhwali-language/): • बीना बेंजवाल शब्द विभूति एवं लोकानुभूति के माध्यम से गढ़वाली भाषा के संरक्षण, उसके प्रचार-प्रसार में अभूतपूर्व योगदान देने वाले नरेन्द्र सिंह नेगी युग प्रतिनिधि गीतकार एवं गायक हैं। उन्होंने शुरुआती दौर में पारंपरिक लोकगीतों को गाकर गढ़वाली भाषा को एक पहचान दी। लगभग तीन दर्जन कैसेट्स में लोकगीतों, गढ़वाली गीतकारों द्वारा रचे गीतों को गाने के साथ-साथ स्वयं 200 से अधिक गीत रचकर, उन गीतों को संगीत एवं स्वर देते हुए गढ़वाली भाषा के विकास में अपना ऐतिहासिक योगदान देते आ रहे हैं।  गढ़वाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की बात जोर-शोर से उठ … - [विलक्षण, बहुमुखी, प्रखर मेधा के धनी हैं ‘गणी’](https://bolpahadi.in/gani-is-unique-versatile-and-rich-in-intelligence/): अग्नि, हवा और पानी- इन तीन ईश्वर प्रदत्त तत्वों के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। चाहे हम मंगल तक की दौड़ लगा लें या दूर प्लेटो तक की। किंतु जहां जीव जगत के लिए ये तत्व हितकर हैं वहीं इनकी अति भी अहितकर सिद्ध हुई। इसलिए ये तीन तत्व हमारे लिए अमरतत्व भी हैं और गरल भी। किंतु जिसने इन तीन तत्वों में स्वयं को ढालने की आत्मशक्ति विकसित कर ली वही सच्चा साधक है और लोकप्रिय भी। सच्चे साधक और लोकप्रियता की इसी श्रेणी में आते हैं विलक्षण, बहुमुखी, प्रखर मेधा के धनी, मातृभाषा प्रेमी … - [अब नहीं दिखते नए पहाड़ी मकानों में उरख्याळी गंज्याळी](https://bolpahadi.in/now-urkhayali-ganjyali-are-not-seen-in-the-new-houses-of-the-mountain/): – डॉ. सुनील दत्त थपलियाल ओखली अब हिन्दी की किताबों में ‘ओ’ से ओखली के अलावा शायद ही कहीं देखने को मिले. उत्तराखंड में ओखली को ओखल, ऊखल या उरख्याळी कहा जाता है. आज भी किसी पुराने मकान के आँगन में ओखल दिख जायेगा. आज यह घर के आँगन में बरसाती मेढ़कों के आश्रय-स्थल से ज्यादा कुछ नहीं लगते हैं. एक समय था जब ओखल का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था, हमारे आँगन का राजा हुआ करता था. ओखली को और नामों से भी जाना जाता है. कहीं इसे ओखल तो कहीं खरल कहा जाता है. अंग्रेज़ी … - [साहित्य प्रेमियों के बीच आज भी जिंदा हैं अबोध बन्धु बहुगुणा](https://bolpahadi.in/abodh-bandhu-bahuguna-is-still-alive-among-literature-lovers/): आशीष सुंदरियाल गढ़वाळी भाषा का सुप्रसिद्ध साहित्यकार अबोध बन्धु बहुगुणा जी जौंको वास्तविक नाम नागेन्द्र प्रसाद बहुगुणा छौ, को जन्म 15 जून सन् 1927 मा ग्राम- झाला, पट्टी- चलणस्यूं, पौड़ी गढ़वाल मा ह्वे। आरम्भिक शिक्षा गौं मा ल्हेणा बाद बहुगुणा जी रोजगार का वास्ता भैर ऐगिन् अर वूंन अपणि उच्च शिक्षा एम.ए. (हिन्दी, राजनीति शास्त्र) नागपुर विश्वविद्यालय बटे पूरी करे। कार्य क्षेत्र का रूप मा वूंन सरकारी सेवा को चुनाव करे अर वो उपनिदेशक का पद से सेवानिवृत्त ह्वेनी। अबोध बन्धु बहुगुणा जी को रचना संसार भौत बड़ु छ। गढ़वाळी का दगड़ दगड़ वूंन हिन्दी मा भि भौत लेखी। परन्तु … - [त्राही-त्राही त्राहिमाम... (गढ़वाली कविता)](https://bolpahadi.in/trahi-trahi-trahimam-garhwali-poem/): • दुर्गा नौटियाल त्राही-त्राही त्राहिमाम,  तेरि सरण मा छां आज। कर दे कुछ यनु काज,  रखि दे हमारि लाज।। संगता ढक्यां छन द्वार, मुस्कौं न घिच्चा बुज्यान। खट्टी-मिट्ठी भितर-भैर, ह्वेगे कनि या जिबाळ। बिधाता अब त्वी बचो,  ईं विपदा तैं हरो। करदे कुछ यनु काज,  रखि दे हमारी लाज।। त्राही-त्राही त्राहिमाम… पित्र होला दोष देंणा, देवता होलु नाराज क्वी। लोग सब्बि बोळ्न लग्यां, त्वी कारण निवारण त्वी। मेरा इष्ट, कुल देबतों,  अब त दिश्ना द्या चुचों। करदे कुछ यनु काज,  रखि दे हमारी लाज।। त्राही-त्राही त्राहिमाम… धाण काज अब नि राई, खिस्सा बटुवा ह्वेगे खालि। लोण तेल लौण कनै, लाला … - [मैं पहाड़ हूं (हिन्दी कविता)](https://bolpahadi.in/i-am-a-mountain-hindi-poem/): मैं पहाड़ (हिमालय) हूंविज्ञान कहता हैयहां पहले हिलोरें मारता सागर थादो भुजाएं आपस में टकराईंपहाड़ का जन्म हुआहिमालय का अवतरण हुआसदियों वीरान रहाधीरे-धीरे वादियों और कंदराओं का उद्गम हुआगंगा पृथ्वी पर आईंकंद मूल फलों से धरा का श्रंगार हुआसब खुशहाल थेमेरे ही गीत गुनगुनाते थेशांत एकांत निर्जन विजनऋषि मुनियों को बहुत भायादेवताओं ने अपनी शरणस्थली बनाईतपस्वी रम गए प्रभु आराधना मेंमनीषियों ने ग्रंथ लिखेकाव्य खंड लिखेचहुंओर संस्कृति औ संस्कृत की ध्वनि गूंजने लगीवेदों की ऋचाएं गाई जाने लगींआक्रमणकारियों ने मेरी शांति भंग कर दीआततायियों के भय सेमनुज ने पहाड़ों का आश्रय लियापहाड़ सैरगाह बन गएसब खुशहाल थेमेरे ही गीत गुनगुनाते थेमैदानी क्षेत्रों … - [कल की सी ही बात है](https://bolpahadi.in/its-like-yesterday/): •  डॉ. अतुल शर्मा प्रकृति के सुकुमारतम कवि श्री सुमित्रानंदन पंत की आज शुभ जयंती है। कल की सी ही बात लगती है कि 1980 के दशक में लेखिका और दिल्ली दूरदर्शन की निदेशिका डॉ. कांता पंत के नई दिल्ली गोल मार्केट एसई जोड एरिया स्थित आवास पर प्रायः पंत जी के दर्शन का सौभाग्य मिलता रहता था। कांता भारती जी का पंत जी ने अपने भतीजे गोर्की पंत से विवाह करा दिया था। इस प्रकार वह कांता पंत हो गयी थीं।  ‘‘मैं पंत जी के दर्शनार्थ प्रायः कवि एवं समीक्षक श्री गोपाल कृष्ण कौल के साथ जाया करता था, … - [जरा बच के ... (व्यंग्य)](https://bolpahadi.in/just-be-careful-satire/): •  प्रबोध उनियाल बहुत समय पहले की बात है, तब इतनी मोटर गाड़ियां नहीं थीं। सबके अपने-अपने घोड़े होते थे। भले ही हम तब भी गधे ही रहे। अस्तु! उस समय मकान की दीवारें ‘टच’ नहीं होती थी बीच में नाली या नाला आपकी सुविधा अनुसार होता था। ‘टच’ के जमाने तो अब आये, चाहे दीवारें ‘टच’ हो या मोबाइल टच…। पुराने लोग गवाह हैं। उनके जमाने की फिल्मों में शम्मी कपूर और मनोज कुमार पेड़ के ही आसपास घूमते हुए हीरोइन को रिझाते थे लेकिन ‘टच’ नहीं करते थे। ये सोशल डिस्टेंस ( Social distance ) के जमाने थे। … - [लॉकडाउन में गूंज रही कोयल की मधुर तान](https://bolpahadi.in/the-melodious-tune-of-the-cuckoo-is-echoing-in-the-lockdown/): • प्रबोध उनियाल ये एक भीड़ भरा इलाका है, जहां मैं रहता हूं। मेरी घर की बालकनी से सड़क पर अक्सर भागते लोग और दौड़ती गाड़ियां ही दिखती हैं। तब कहीं न कहीं इस भीड़ में आप भी हैं। अभी तक मैंने इस सड़क को देर रात में ही थोड़ी सी सांस लेते देखा है। लेकिन लॉकडाउन के चलते एक निश्चित समय की छूट के बाद ये सुनसान सी पसरी पड़ी देख रहा हूं। आजकल दिनचर्या सामान्य नहीं है। कामकाज के दिनों में आपका समय उसी हिसाब से बंधा होता है। पूरे दिन के इस खाली समय में आपको अपने … - [भाई साहब घर में हैं (व्यंग्य)](https://bolpahadi.in/brother-is-at-home-satire/): • प्रबोध उनियाल कुछ भाई साहब तो आजकल बर्तनों के साथ फर्श को भी रगड़-रगड़ कर चमका रहे हैं। आजकल अधिकांश पत्नियां, पतियों को क्या काम देना है इसका खूब गुपचुप सलाह मशविरा सहेलियों से ले रही हैं?         पहली बार आप कई दिनों से चौबीस घंटे पत्नी के साथ हैं। कुछ गजब ही हो रहा है। आदमी जहां हर वक्त दरवाजे से बाहर जाने की जुगत देखता था वहीं कुछ ऐसा हो रहा है कि पत्नी उठे, आगे चले तो पीछे-पीछे भाई साहब भी! इनदिनों कुछ यंत्रवत से तमाम पति, पत्नी के चारों ओर ना जाने … - [महा क्रांति आमंत्रित कर (हिन्दी कविता)](https://bolpahadi.in/inviting-great-revolution-hindi-poem/): तेरे शोणित, तेरी मज्जा से – सने धवल प्रासाद खड़े।तेरी जीवन से ही निर्मित,तेरी छाती पर किन्तु अड़ेइनको करके दृढ़ से दृढ़तर,तू स्वयं बना कृश से कृशतर।नर कहूं तूझे। तेरे विनाश के नित नूतनषडयंत्रों के मंत्रणागार।तेरी ही शोषण का इनमें,होता है क्षण-क्षण पर विचार।तेरी करुणा, तेरे कुन्दन,ठुकराए जाते हँस हँस करकर महा क्रान्ति आमंत्रित करनर कहूं तुझे। अपना जीवन यौवन देकर,अपना प्यारा तन-मन देकर,कुछ, चांदी के टुकड़ों पर ही –अपने जीवन को खो, खोकर,तूने ही इनको खड़ा किया,तेरे गवाह ईटें पत्थर।कर महा क्रांन्ति आमंत्रित करनर कहूं तुझे। अपना सब कुछ खोकर जीनायह ग्लानि-गरल पीना, पीना।कैसे सह लेता है सीना ?यह भी … - [अलविदा इरफान! इतनी भी जल्दी क्या थी..](https://bolpahadi.in/goodbye-irfan-what-was-the-hurry/): प्रबोध उनियाल / फिल्म अभिनेता इरफान खान का यूं चले जाना स्तब्ध करता है। उनके जज्बे से लगने लगा था कि वह अपनी यह लड़ाई जीत लेंगे। जीतकर आए भी लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। गिनतियों में ही इरफान जैसे प्रतिबद्ध कलाकार सिनेमा को मिलते हैं। अभिनय हो या बीमारी की जंग उन्होंने हमेशा अपना जज्बा कायम रखा। यही वजह रही कि वे कई निर्देशकों की पहली पसंद थे। अभिनय की और बारीकियां भले ही उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से सीखी हों लेकिन उनके व्यक्तित्व में कला का एक संपूर्ण व्यक्ति जैसे जन्मजात ही रहता हो। सीधा, … - [मारियो वार्गास ल्योसा की कृति ‘किस्सागो’ का परिचय](https://bolpahadi.in/introduction-to-mario-vargas-llosas-work-kissago/):  ● डॉ. अतुल शर्मा ‘किस्सागो’ मारियो वार्गास ल्योसा का महत्वपूर्ण उपन्यास लातिन अमरीकी देश ‘पेरु’ के आदिवासियों पर आधारित है। आधुनिक विकास और नदी, पर्वत, सूरज, चांद, दुष्ट आत्माओं; की एक के बाद एक निकलती कथाओं का सिलसिला है। विषम परिस्थितियों से जूझते और बार-बार स्थानांतरित होने को विवश बंटे हुए माचीग्वेरा समाज को जोड़ने वाली कड़ी है- ‘किस्सागो’ यानि ‘आब्लादोर उपन्यासकार एक किरदार के रुप में उपस्थित है।’ आदिवासी जीवन पर केन्द्रित होने के नाते उपन्यास में बीसियों पेड़, पौधे, पशु, पक्षी, नदियों, पहाड़ों, देवताओं, दानवो के नाम आते हैं। उपन्यास में कथाओं का सिलसिला जारी रहता है। एक … - [जब देहरादून आए थे राष्ट्रीय कवि 'दिनकर'](https://bolpahadi.in/when-national-poet-dinkar-came-to-dehradun/): (राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि पर विशेष) मेरे नगपति! मेरे विशाल!साकार दिव्य गौरव विराटपौरुष के पुंजीभूत ज्वालमेरी जननी के हिम किरीटमेरे भारत के दिव्य भाल।मेरे नगपति मेरे विशाल। राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की यह प्रसिद्ध कविता “हिमालय के प्रति“ एक कालजयी कविता है। दिनकर जी हिन्दी काव्य साहित्य के सूर्य है। छायावादी युग के बाद प्रगतिवादी काव्यधारा में उनका विशेष स्थान तो है ही पर स्वाधीनता सेनानी के रुप में भी उनका अवदान है। मुझे याद है कि 70 के दशक में देहरादून में आयोजित एक कवि सम्मेलन के मंच पर अध्यक्षता कर रहे राष्ट्रीय कवि … - [मील का पत्थर साबित हुई थी ‘27 डाउन’](https://bolpahadi.in/27-down-proved-to-be-a-milestone/): प्रबोध उनियाल ।    फिल्म ‘भुवन शोम’ की कामयाबी के बाद हिंदी सिनेमा के इतिहास में व्यवसायिक सिनेमा के समांतर नए सिनेमा का विकास तेजी से हुआ। फार्मूला फिल्मों की जकड़ से बाहर निकालकर तब नए सिनेमा के आंदोलन में कई बेहतरीन फिल्में बनाई गईं। उन बेहतरीन फिल्मों में से एक फ़िल्म थी ‘27 डाउन’। युवा निर्देशक अवतार कृष्ण कौल की यह एकमात्र निर्देशित फिल्म थी जिसे 1974 में सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि जब फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार देने की घोषणा हुई तो तभी अवतार कृष्ण कौल एक दुर्घटना के शिकार … - [पृथ्वी दिवस पर घरों में बंद दुनिया](https://bolpahadi.in/world-closed-at-home-on-earth-day/): डॉ. अतुल शर्मा आज धरती को रहने योग्य बनाये रखने के संकल्प का दिन। यह सांकेतिक है। धरती पर प्रदूषण और उसके साथ उस पर भोगवादी सोच की मार। नदियाँ प्रदूषित, वायुमंडल दूषित, कटते जंगल, खेतों पर इमारतें उगना आदि बहुत सी चुनौतियों के बीच धरती दिवस का महत्व और भी ज़रुरी हो गया है। आग के गोले से धरती में बदलने की विस्तृत प्रक्रिया है। फिर उसपर जीवन का उदय। परिवर्तन हुए और लम्बी यात्रा के बाद यह समय आया। अब सब को क्या करना है यह सभी को सोचना और उसपर चलना है। आज के संदर्भ में स्थिति … - [भुवन शोम से हुई प्रयोगधर्मी सिनेमा की शुरूआत](https://bolpahadi.in/experimental-cinema-started-with-bhuvan-shome/): – प्रबोध उनियाल  ।  फिल्मकार मृणाल सेन द्वारा वर्ष 1969 में ‘भुवन शोम’ का निर्माण आधुनिक भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर साबित हुई। ये एक नए सिनेमा के विमर्श का आरंभ था। व्यवसायिक सिनेमा हिंदी दर्शकों के लिए एक स्वस्थ और निरापद मनोरंजन भर था। साफ-सुथरी फिल्में भी थीं जिन्हें पूरा परिवार एक साथ बैठकर देख सकता था। अपवाद हो सकता है लेकिन अधिकांश फिल्मों में कलात्मकता व बौद्धिक संवेदना कम दिखती थी। सिनेमा को लेकर मध्यमवर्गीय सोच अपने तरीके की थी। वह अभी सुदूर देहात तक नहीं पहुंचा था। उसकी पटकथा में आम जनजीवन उतना उभर कर नहीं आया। … - [सद्भाव के रंगों का पर्व है होली](https://bolpahadi.in/holi-is-the-festival-of-colors-of-harmony/): प्रबोध उनियाल / फागुन पूर्णिमा को मनाए जाने वाला होली का पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष का अंतिम तथा जन सामान्य द्वारा मनाये जाने वाला सबसे बड़ा रंगों का त्योहार है. यह पर्व उल्लास का पर्व भी है, जिसमें सभी वर्ण एवं जाति के लोग बिना वर्ग भेद के सम्मिलित होते हैं. आदि -स्रोत वेदों और पुराण में उल्लेख होने के कारण होली का पर्व वैदिक कालीन पर्व भी कहा जा सकता है. प्राचीन मान्यता है कि लोग इस पर्व में खेतों में उगी आषाढ़ी फसल  गेहूं ,जौ व चना आदि की आहुति देकर तदनंतर यज्ञशेष प्रसाद ग्रहण करते … - [आधुनिक गढ़़वाली कविता का संक्षिप्त इतिहास](https://bolpahadi.in/a-brief-history-of-modern-garhwali-poetry/): भीष्म कुकरेती (मुंबई) // गढ़़वाली भाषा का प्रारम्भिक काल गढ़़वाली भाषाई इतिहास अन्वेषण हेतु कोई विशेष प्रयत्न नहीं हुए हैं। अन्वेषणीय वैज्ञानिक आधारों पर कतिपय प्रयत्न डॉ. गुणानन्द जुयाल, डॉ. गोविन्द चातक, डॉ. बिहारी लाल जालंधरी, डॉ. जयंती प्रसाद नौटियाल ने अवश्य किया किन्तु तदुपरांत पीएचडी करने के पश्चात इन सुधिजनों ने अपनी खोजों का विकास नहीं किया और इनके शोध भी थमे रह गए। डॉ. नन्दकिशोर ढौंडियाल और इनके शिष्यों के कतिपय शोध प्रशंसनीय हैं पर इनके शोध में भी क्रमता का नितांत अभाव है। चूंकि भाषा के इतिहास में क्षेत्रीय इतिहास, सामाजिक विश्लेषण, भाषा विज्ञान आदि का अथक … - [मान राम (हिन्दी कविता)](https://bolpahadi.in/maan-ram-hindi-poem/): अनिल कार्की // मानराम !ओ बूढ़े पहाड़लो टॉफी खा लोचश्मा पौंछ लो मेरे पुरखे टॉफी की पिद्दी सी मिठासतुम्हारे कड़वे अनुभवों कोमीठा कर सकेगीमैं यह दावा कतई नहीं करूंगा आंखों में जोर डालो मानरामहम डिग्री कॉलेज के पढ़े हुए तुम्हारे बच्चेतुमसे पूछना चाहते हैं जीवन के सत्तानबे साल कैसे गुजरे ?क्या काम किया ?क्या गाया ?कैसा खाया ?कितनी भाषाएं बोल लेते हो ? नहीं मान रामहमें नहीं सुननी तुम्हारी गप्पेंतुम रोओ नहीं हमारे सामनेतुम्हारे आंसुओं में आंकड़े नहींजो हमारे काम आ सकेंया कि जिनसे हम लिख सकें बड़ी बात मान राम देश तुम्हारे हाथ का बुनाटांट का बदबुदार पजामा नहींदेश … - [हमर गौंम (गढ़वाली कविता)](https://bolpahadi.in/hamar-gaum-garhwali-poem/): हमर गौंम,आइडिया नेटभर्क च,गोर, बछरू, भ्याल हकै,मनखि निझर्क च। हमर गौंम,पीडब्ल्डी सड़क च,मनखि भितर सियुं,भैर बांदर बेधड़क च। हमर गौंम,ऊर्जा निगमै बिजलि च,भैर मनखि उज्यळु,भितर अंध्यरु च। हमर गौंम,सरकरि प्राथमिक इस्कोल च,नाति पढ़णौ प्रावेट इस्कोल,बाजार भेज्यूं च। हमर गौंम,जल संस्थान कू पाणि च,बस भौत ह्वेगि यिख,अब देरादूनै स्याणि च। - [चुनौ बाद (गढ़वाली कविता)](https://bolpahadi.in/chunau-baad-garhwali-poem/): बिकासन बोलिपरदान जी!मिन कबारि औण ?पैलि तुमारा घौर औणकि/ गौं मा औण? अबे! ठैर यारबिन्डी कतामति न कारपैलि हिसाब त् लगौण देतेरा बानौ खर्च कत्था ह्वे भुकौं कथगा कुखड़ा खलैनबोत्ळयूं पर छमोटा कै कैन लगैनकथगौं करै अबारि ‘चुनौ टूरिज्म’अर कै- कैन करिन रुप्या हज्म कै कैतै ब्वन्न प्वड़े ई बाबाकैका खुट्टौं मा धैरि साफाक्य-क्य बोलि झूठ अर सचकैका शांत करिन् गुळमुच पदान जी! फेर बि…क्वी टैम क्वी बग्तऽ ? अबे! जरा थौ बिसौंघड़ेक गिच्चा परैं म्वाळु लगौतिन बि कौन से अफ्वी हिटिक औणखुट्टौं बिगर त् तिन बि ग्वाया लगौण पुजण प्वड़ेला बिलौका द्यब्ताखबेसूं तै बि गड़ण प्वडे़ला उच्यणाबिधैकज्या नौ बि … - [इंसानी जीवन के रेखांकन की कविताएं](https://bolpahadi.in/poems-depicting-human-life/): पुस्तक समीक्षा-  जलड़ा रै जंदन (गढ़वाली कविता संग्रह) डॉ. नंद किशोर हटवाल // कविताओं को अपने समय और समाज का दर्पण कहा जाता है। अपेक्षा की जाती है कि उसमें हमारा ‘आज’ हो। कविताएं अपने भाषाई और सामाजिक वर्ग की विशिष्टताओं और चिंताओं से भी परिचित कराए। उनमें उस वर्ग के अंतिम व्यक्ति की चिंताएं प्रतिध्वनित हों। अपनी माटी की खुशबू और प्रकृति की रम्यता में इंसान कहीं खो न जाए। कविता इलाकाई और भाषाई सीमाओं से बाहर निकली हुई, हवा की तरह आजाद और पानी की तरह सार्वभौम हो। उसमें अपने अंचल की मिठास तो हो लेकिन जकड़न न … - [गैळ बळद (गढ़वाली कविता)](https://bolpahadi.in/gail-bald-garhwali-poem/): जब बटे हमरु गैळ बळ्दफेसबुक फर फेमस ह्वेतब बटिवो बळ्द/ बळ्द नि रैसेलिब्रिटी बणिगेअर मिवेकु सबसे बड़ु फैनउन्त सिर्फ मि नासर्या दुन्या आज वेकी फैन चतबि तवे दगड़ सेल्फी खिचाण वळों कीइतगा लम्बी लैन चलोग पागल हुयां छन वेका बानहर क्वी कनू च वेको गुणगानलाइक कमेंट शेयर कना छनलोग धड़ाधड़क्वी दिल चिपकाणू चक्वी अंगुठा दिखाणू चक्वी वे तैं अपणि गौड़ी कु बोड़त क्वी वे तैंअपणि बाछी कु बुबा बताणू चजैको ब्याळी तक क्वी कामकाज नि छौवो आज ये बळ्दै कान्ध कन्याणू चचैनल वळाहमारि छानि बटे लाइव प्रसारण कना छनअरवेका बारम् इनि- इनि बात ब्वना छनजो मि तैं भि नि छन … - [उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रों की ये जनजातियां](https://bolpahadi.in/these-tribes-live-in-the-border-areas-of-uttarakhand/): नवीन चंद्र नौटियाल // उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों के समाज में अन्य के साथ ही कई जनजातियां भी सदियों से निवासरत हैं। इनमें भोटिया, जौनसारी, जौनपुरी, रंवाल्टा, थारू, बोक्सा और राजी जातियां प्रमुख हैं। अब तक इतिहास से संबंधित प्रकाशित पुस्तकों में इनका काफी विस्तार से वर्णन भी मिलता है। ऐसी ही कुछ किताबों से पर्वतीय राज्य की जनजातियों को संक्षेप में जानने का प्रयास किय गया है। भोटिया जनजाति :  उत्तराखंड की किरात वंशीय भोटिया जनजाति का क्षेत्र कुमाऊं- गढ़वाल से लेकर तिब्बत तक फैला हुआ है। भोटिया समुदाय के लोग अपनी जीवटता, उद्यमशीलता और संस्कृतिक … - [दाताs ब्वारि, कनि दुख्यारि (गढ़वाली कहानी)](https://bolpahadi.in/datas-bwari-kani-dukhyari-garhwali-story/): कथाकार – भीष्म कुकरेती // गौं मा इन कबि नि ह्वे. इन कैन बि कबि नि देखी. हाँ बुन्याल त- गाँ मा क्या अडगें (क्षेत्र) मा झबरी ददि सबसे दानि मनखिण च, ह्वेगे होली  पिचाणा-छयाणा साल कि, पण कुनगस च बल झबरी ददि न बि इन अचर्ज नि द्याख. बैदजी ऐ- ऐक थकिगेन. वैदजीन क्या- क्या जि नि कार! पण दाता कि ब्वारि गौमती फर क्वी फरक इ नि पोड़. बैद चिरंजीलाल तै अफु पर इ रोष ऐगे, गुस्सा ऐगे. वैन आन नि द्याख जान नि द्याख अर गुस्सा मा अपणो इ सुयर भेळुन्द चुलै दे. अरे इन कबि नि … - [विलक्षण था आचार्य चक्रधर जोशी का जीवन](https://bolpahadi.in/acharya-chakradhar-joshis-life-was-extraordinary/): गिरधर पंडित / आचार्य पंडित चक्रधर जोशी मूलतः दाक्षिणात्य ब्राह्मण परिवार से थे। यहां पर यह भी उल्लेख करना उचित होगा कि देवप्रयाग में बहुतायत ब्राह्मण दक्षिण भारत से हैं। जिनका संबन्ध आर्यों की पंच द्रविड़ शाखा से है। जोशी परिवार भी उसी में से है। हिंदी तिथियों के अनुसार आचार्य जी का जन्म वामन द्वादशी को हुआ था। जोशी परिवार दक्षिण भारत में कहां से आये थे इस पर देवप्रयाग के बहुभाषाविद, संस्कृत के कवि नाटककार बहुमुखी प्रतिभा के धनी पं. मुरलीधर शास्त्री के अनुसार :- ‘आंध्र प्रदेशे शुभ गौतमी तटे, धान्यै युते कांकरवाड़ ग्रामेंकौण्डिल्य गोत्रे द्विजवर्य गेहे, जातो … - [पहाड़ के गांवों की ऐसी भी एक तस्वीर](https://bolpahadi.in/another-such-picture-of-mountain-villages/): नरेंद्र कठैत// साहित्यिक दृष्टि से अगर उत्तराखण्ड की आंचलिक पृष्ठभूमि को स्थान विशेष के परिपेक्ष्य में देखना, समझना चाहें तो इस श्रेणी में पहाड़ से गिने-चुने कलमकारों के नाम ही उभरकर सामने आते हैं। कुमाऊं की ओर से पहाड़ देखना, समझना हो तो टनकपुर से चिल्थी, चम्पावत, लोहाघाट, घाट होते हुए पिथौरागढ़ तक शैलेश मटियानी अपनी कहानियों के साथ ले जाते हैं। गढ़वाल की ओर से साहित्यकार मोहन थपलियाल, विद्यासागर नौटियाल, कुलदीप रावत, सुदामा प्रसाद प्रेमी हमें घुंटी-घनसाली, पौखाळ, डांगचौरा, श्रीनगर, कांडा, देलचौंरी, बिल्वकेदार, कोटद्वार, गुमखाल, कल्जीखाल, दूधातोली, मूसागली जैसे कई स्थान विशेष के न केवल नामों से बल्कि कहीं … - [मैंने या तूने (हिन्दी कविता)](https://bolpahadi.in/i-or-you-hindi-poem/): प्रदीप रावत ‘खुदेड़’ // मैंने या तूने,किसी ने तो मशाल जलानी ही थीचिंगारी मन में जो जल रही थीउसे आग तो बनानी ही थीमैंने या तूने,किसी ने तो मशाल जलानी ही थी। मरना तुझे भी हैमरना मुझे भी हैयूं कब तक तटस्थ रहता तूयूं कब तक अस्पष्ट रहता तूफिर किस काम की तेरी ये जवानी थीमैंने या तूने,किसी ने तो मशाल जलानी ही थी। रो रही धारा ये सारी हैवक्त तेरे आगे खड़ा हैतय कर तूतुझे वक्त के साथ चलना हैया कोई नया किस्सा गढ़ना हैये तेरी ही नहीं लाखों युवाओं की कहानी थीमैंने या तूने,किसी ने तो मशाल जलानी … - [गढ़वाल की राजपूत जातियों का इतिहास (भाग-1)](https://bolpahadi.in/history-of-rajput-castes-of-garhwal-part-1/): संकलनकर्ता- नवीन चंद्र नौटियाल // उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र में निवास करने वाली राजपूत जातियों का इतिहास भी काफी विस्तृत है। यहां बसी राजपूत जातियों के भी देश के विभिन्न हिस्सों से आने का इतिहास मिलता है। इसी से जुड़ी कुछ जानकारियां आपसे साझा की जा रही हें। क्षत्रिय/ राजपूत :- गढ़वाल में राजपूतों के मध्य निम्नलिखित विभाजन देखने को मिलते हैं – 1. परमार (पंवार) :- परमार/ पंवार जाति के लोग गढ़वाल में धार गुजरात से संवत 945 में आए। इनका प्रथम निवास गढ़वाल राजवंश में हुआ। 2. कुंवर :- इन्हें पंवार वंश की ही उपशाखा माना जाता … - [अरे! यु खाणू बि क्य- क्य नि कराणू! (गढ़वाली व्यंग्य)](https://bolpahadi.in/oho-yu-khanu-bi-kya-why-ni-karanu-garhwali-satire/): नरेन्द्र कठैत    खाणू जैका हथ मा आणू, दुन्या मा वी राणू। अर जैका हथ मा खाणू नि आणू, वू रोणू, गंगजाणू। पर जु खाणू, वू खैकि तागत अजमाणू, खयां मा बि हौर हत्याणू, बच्यूं-खुच्यूं गंमजाणू, गबदाणू, खपाणू, मर्जी औणी हौर्यूं खुणी बि लि जाणू। कबि इन बि सुण्ण मा आणू कि मनखी खाणू त खूब खाणू पर वेकु खयूं झणी कख जाणू? अर कबि बल खाणू त खाण चाणू पर खाणू वेका गौळा उंद नि जाणू। कबि इन बि ह्वे जाणू कि खलौण वळा तैं अण्दाज हि नि आणू किलैकि खाण वळो त मिस्ये जाणू पर कथगा खाण न … - [45 बर्षों के बाद निकलेगी मां अनुसूया की देवरा यात्रा](https://bolpahadi.in/45-%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82/): – दशहरे के दिन से होगी देवरा यात्रा की शुरूआत  रजपाल बिष्ट // जनपद चमोली की मंडल घाटी में पुत्रदायिनी के रूप में विख्यात सती माता अनुसूया देवी की देवरा यात्रा की तैयारियां शुरू हो गई हैं। इसवर्ष 45 वर्ष बाद मां भगवती की उत्सव डोली देवरा यात्रा पर निकलेगी। मां भगवती अनुसूया देवी 1973-74 के बाद देवरा यात्रा पर निकल रही हैं। धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय परंपराओं में माता अनुसुया को पुत्रदायिनी माना गया है। 45 वर्ष बाद शुरू होने वाली देवरा यात्रा का निर्णय अनुसूया मंदिर ट्रस्ट की बैठक में लिया गया। माता की मंडल घाटी के खल्ला … - [गढ़वाल की ब्राह्मण जातियों का इतिहास- (भाग 1)](https://bolpahadi.in/history-of-brahmin-castes-in-garhwal/): उत्तराखंड के गढ़वाल (मंडल) परिक्षेत्र में अनेकों जातियों का निवास है। उनका इतिहास हमारी धरोहर है। जरूरी है कि आज और आने वाले कल में नई पीढ़ियां भी इससे वाकिफ हों, यह प्रयास है। यहा निवासरत जातियां कैसे यहां बसे, कहां से और कब यहां आए, इन्हीं सब बिन्दुओं को इतिहास की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों से संदर्भ सहित संकलित किया जा रहा है। इस शृंखला के पहले भाग (भाग- 01) में आइए जानते हैं गढ़वाल में निवास कर रही ब्राह्मण जातियों के विषय में- ब्राह्मण :– गढ़वाल में निवास करने वाली ब्राह्मण जातियों के बारे में यह माना जाता है … - [महज 4 खेतों में उगा दी 27 तरह की फसलें](https://bolpahadi.in/27-types-of-crops-grown-in-just-4-fields/): हिमालयी राज्य उत्तराखंड में ‘चिपको’ और ‘बीज बचाओ’ आंदोलन की प्रयोग भूमि जनपद टिहरी की ‘हेंवल घाटी’ का रामपुर गांव। यह गांव चिपको और बीज बचाओ आंदोलन की प्रमुख कार्यकर्ता सुदेशा बहन और प्रसिद्ध पत्रकार कुंवर प्रसून का गांव भी है। हाल में मैं भी इस गांव में पहुंचा। यहां आकर मालूम पड़ा कि चिपको और बीज बचाओ आंदोलन से जुड़े हमारे साथी साहब सिंह सजवाण और उनकी सास सुदेशा बहन ने मिलकर बीज बचाओ के आंदोलन को सार्थकता और विस्तार देने के लिए सिर्फ चार खेतों में ही 27 तरह की फसलें उगा डाली हैं। वह भी बिना रासायनिक … - [अब त वा (गढ़वाली ग़ज़ल)](https://bolpahadi.in/ab-ta-wa-garhwali-ghazal/): प्रदीप सिंह रावत ‘खुदेड़’ // अब त वीं लोळी तै हमारि याद बि नि सतांदी, अब त वा लोळी हमते अपड़ू बि नि बतांदी। झणी किले रुसई गुसाई छ वा आजकल मैसे, अब त वा लोळी हमरा स्वीणो मा बि नि आंदि। हमतै विंकि आंख्यूंन घैल होणो ढब पोड़ग्ये छौ, पर अब वा लोळी आंख्यूं का तीर बि नि चलांदि। बाटा मा मिलि मै तै अचणचकि वा लोळी आज, मै देखि झणि किलै अब अपड़ि मुखड़ि लुकांदि। आंखि आंख्यूं मा छ्वीं लगांदि छै ज्वा कबि, अब वा मै तै आंख्यूं बटि खौड़ सि किलै बिरांदि। सज धजी फ्योंली सि बणि … - [गढ़वाली भाषा की वृहद शब्द संपदा](https://bolpahadi.in/garhwali-languages-vast-vocabulary/): संकलन- नवीन नौटियाल //  उत्तराखंड राज्य के भूभाग गढ़वाल मंडल के प्रशासनिक भू-क्षेत्र की सीमाएं समय-समय पर बढ़ती-घटती रहीं हैं। गढ़वाल से तात्पर्य उस समस्त भू-भाग से है जहां आज गढ़वाली भाषा/ बोली प्रचलन में है अथवा इतिहास के कालखंड में प्रचलन में रही है। गढ़वाली भाषा/ बोली की शब्द- सम्पदा और समृद्धि को निम्नलिखित उदाहरणों के माध्यम से बेहतर समझा जा सकता हैं – 1. गढ़वाली भाषा में अनगिनत क्रियापद हैं।  जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं-  हरचण – खोना, गंवाना;  बुजण – बंद होना;  घटण – कम होना;  घैंटण – गाढ़ना;  बाण – हल लगाना;  बुतण – … - [आखिर यम हैं हम..!!! (हास्य-व्यंग्य)](https://bolpahadi.in/after-all-we-are-yama-satire/): धनेश कोठारी // ************* ब्रह्मलोक में वापस लौटते ही यमराज अपना गदा एक तरफ, मुकुट दूसरी तरफ, भैंस तीसरी तरफ और बर्दी चौथी साइड फेंककर अमरीश पुरी के अंदाज में गरजे- आखिर यम हैं हम!! यमराज के इस अंदाज को देखकर पहले पहल चित्रगुप्त महाराज सन्न रह गए। उन्होंने यमराज का कभी ऐसा रूप नहीं देखा था और ना ही उनकी ऐसी डायलॉग डिलीवरी देखी थी!! एकबारगी वह यमराज का अनपेक्षित आक्रोश देखकर कांपे, मगर फिर चुपके से पूछा- मित्र यम! क्या बात है ?? आज अकारण रोष क्यों ?? पृथ्वीलोक में सब खैरियत तो है ?? यमराज- बस, पूछो … - [20 साल बाद लौटी वेदनी बुग्याल की रौनक](https://bolpahadi.in/vedni-bugyals-glory-returned-after-20-years/): • गुलाबी फूलों ने बिखेरी सुंदरता… • अनगिनत फूलों से बिखरी रंगत, पर्यटकों का इंतजार मानूसन की बारिश से भले ही उत्तराखंड के पहाड़ी हलकों में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई हो, लेकिन हिमालय में मौजूद वेदनी बुग्याल के लिए मानसून की झमाझम बारिश वरदान साबित हुई है। शीतकाल में भारी हिमपात से सूख चुके वेदनी बुग्याल के वेदनी कुंड को नवजीवन मिला। जिससे वेदनी कुंड पानी से लबालब भर गया। अब यहां खिले अनगिनत फूलों ने वेदनी बुग्याल की सुंदरता पर चार चांद लगा दिए हैं। खासतौर पर इनदिनों गुलाबी फूल प्रचुर मात्रा में खिले हैं। वेदनी बुग्याल ही नहीं … - [गढ़वाली भाषा के उपभेद](https://bolpahadi.in/garhwali-language-strains/): संकलन- नवीन नौटियाल // **********           उत्तराखण्ड के गढ़वाल मण्डल में बोली जाने वाली भाषा को गढ़वाली कहा जाता है। गढ़वाली के अंतर्गत कई उपभाषाएँ और बोलियाँ शामिल हैं। समस्त गढ़वाल में गढ़वाली भाषा व्यवहारिक रूप में बोली जाती है जिसका सामान्य एवं मुख्य रूप श्रीनगर और उसके आसपास प्रयुक्त की जाने वाली बोली को माना जाता है। ग्रियर्सन ने गढ़वाली को आठ बोलियों ( श्रीनगरिया, बधाणी, दस्योली, मांझ-कुमय्या, नागपुरिया, सलाणी, राठी एवं टिरियाली ) में विभाजित किया था। जबकि तत्पश्चात किए गए अध्ययनों एवं शोध-कार्यों में गढ़वाली की 15-20 बोलियाँ प्रकाश में आयी हैं। गढ़वाली … - [गढ़वाली भाषा का शब्द वैभव](https://bolpahadi.in/garhwali-word-vaibhav/): संकलन- नवीन नौटियाल // ******* गढ़वाल को ‘मध्य हिमालय’ के नाम से भी जाना जाता है। इतिहास में इस ‘मध्य हिमालयी’ क्षेत्र में कोल, भील, किरात, नाग, आर्य, द्रविड़ आदि अनेक जातियों का निवास रहा है। वर्तमान समय में प्रचलित गढ़वाली भाषा पर इन जातियों के शब्दों का प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है। ● खस जाति से आए शब्द – नखरु, बेड़, बुजण, बूखु, बेथ, बैंदार, लैंदु आदि। ● तिब्बती-बर्मी समुदाय से आए शब्द – पंखी, फंचि/फंचु. अंगड़ि, गौथ, चराण, उस्ययूँ आदि। ● आस्त्रिक मूल के शब्द – कपाळ, बोई, दाड़िम, छेमी, टिमरु, बेडू, रिंगाळ आदि। ● मुंडा … - [निःसंग जी के बहाने वर्तमान संदर्भ पर दो शब्द](https://bolpahadi.in/two-words-on-the-current-context-in-the-name-of-nissang-ji/): नरेन्द्र कठैत // ************  श्री शिवराज सिंह रावत निःसंग जी पर अभिनन्दन ग्रंथ और वर्तमान सन्दर्भ में दो शब्द!           पाश्चात्य कलमकारों ने इस देवभूमि से जो कुछ समेटा उसका आंकलन करने के लिए किसी कलमकार की लिखी यह पंक्ति  ‘धनुष भी उनके, बाण भी उनके, अपनी केवल आंख’ ही पर्याप्त है। कौन नहीं जानता एटकिन्सन हो या ग्रियसन, दोनों ने वर्णित सामग्री अपनी तात्कालीन आंख अर्थात अपने मातहतों के माध्यम से ही जुटाई। किन्तु क्या कारण है कि आज भी हम भूत-पिचास-अयेड, बांज-बुरांस, घास-पात को पहचानने के लिए इ.टी. एटकिन्सन और अपनी भाषा की व्यवहारिकता … - [मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं...! (भाग - 2)](https://bolpahadi.in/i-am-laxmanjhula-bridge-part-2/): हां, मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं! मैं अब बूढ़ा हो चला हूं। लेकिन मैं इतना कमजोर भी नहीं की मृत्यु के आगे नतमस्तक हो जाऊं…। मैं महाभारत के भीष्म की वह प्रतिज्ञा हूं, जो रणभूमि में बाणों की शैय्या पर लेटे हुए भी मृत्यु को अपने बस में कर सकता हूं। मैं महर्षि दधीचि हूं, जो अपनी प्राण शून्यता के बाद भी अपनी हड्डियों से बज्र का निर्माण कर सकता हूं। मैं हाड मांस का इंसान जैसा पुतला नहीं, जो छित, जल, पावक, गगन ओर समीर में विलय हो जाऊं। मैं फौलाद से गढ़ा गया हूं और कभी मिट भी गया … - [यलगार चहेणी (गढ़वाली कविता)](https://bolpahadi.in/yalgar-chaheni-garhwali-poem/): प्रदीप रावत “खुदेड़”// ********************* म्येरा पाड़ तै ज्वान नौनो कि दरकार चाहेणी च , दिल्ली देहरादून न गैरसैणे कि सरकार चहेणी च । जू रोजगार का बाद बी उंदा बस्ग्येन तौंते छोड़ा , जू सच्चा हिमपुत्र छन तौंकी ललकार चहेणी छ । मास्टर अपड़ा नौनो तै सरकरि इस्कूल मा पढ़ाण , पहाड़ मा इना मास्टरूं कि लंग्त्यार चहेणी छ । स्यू बी चुनौ जीती कि देहरादून जगता नि व्हान , इख समर्प्रित नेतों कि इख अगल्यार चहेणी छ । हर रोज हर हफ्ता हर मैना स्यूं पर घचाक मार , जनता बी पाड़े इख जागरूक दार चहेणी छ । अन्याय … - [मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं..!](https://bolpahadi.in/i-am-laxmanjhula-bridge/): मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं..! पहचाना मुझे… क्यों नहीं पहचानोगे… आखिर आपने और आपकी पीढ़ियों ने एक नहीं बल्कि कई बार मुझे जिया है। मेरी बलिष्ठ भुजाओं पर विश्वास करके न जाने कितनी बार तुमने मेरे सहारे गंगा के इस छोर से उस छोर का सफर तय किया। आज मैं आपको बता रहा हूं… कि मैं बूढ़ा हो चला हूं…। मेरी हड्डियां अब दर्द देने लगी हैं…, मेरी कमर झुक गई है…, मेरे बाल पक गए हैं…, मैं अब पहले से ज्यादा लड़खड़ाने लगा हूं…, मेरी भुजाओं में अब वह जोर नहीं कि मैं अपनी औलादों के भार को ज्यादा देर … - [सुदामा चरित नाटिका (गढवालि भाषा)](https://bolpahadi.in/sudama-character-drama-garhwali-language/): नरोत्तम दास जी से प्रेरित स्टेज मा सुदामा अर वूं कि पत्नी सुशीला टूटीं फूटीं झोपड़ि का भितर बैठ्यां छन। सुशीला कु सुदामा से – (दोहा) हे स्वामी जी कृष्ण तुमारा, बचपन का छन मीत । दीनदयाल छन प्रभु, करिल्या वूं से प्रीत ।। गाना- लय – कैल बजै मुरूली दुःख होयुं च अति भारी, हो स्वामी हथ जोड़िक बिनती । द्वारिका का नाथ स्वामि, कृष्ण जि भगवान । दुःख दरिद्र हरि देंदा दिन दयाल नाम । जावा हो स्वामी जी तुम तख, हथ जोड़िक बिनती । सुदामा कु सुशीला से – गाना, लय – द्वि हजार आठ भादौं का … - [इ ब्यठुला - इ जनना (गढ़वाली)](https://bolpahadi.in/i-bythula-i-janna-garhwali/): गीत (अनुवादित) / पयाश पोखड़ा // ************************* इ ब्यठुला इ जनना कै भि चीजि की खत-पत खत्ता फोळ नि करदा न बेकार करदा न बरबाद करदा बिटोळणा रंदि समळणा रंदि ढकणा रंदि बंधणा रंदि ह्वै साक जख तक आस विसवास तक कभि तुलपाणा रंदि कभि टंक्यांणा रंदि कभि घम्याणा रंदि कभि हवा बतास कभि छट्यांणा रंदि कभि बिराणा रंदि कभि त्वड़णा रंदि कभि ज्वड़णा रंदि कतगै दां अपणै घारम खालि डब्बा जमा करणा रंदि कभि कागज पत्तर कभि धोति कत्तर उलटणा पुलटणा अर गुलटणा रंदि सुबेरा की कल्यौ रोटि रुमक दां म्वड़खी बणै चपाणा रंदि खाणा रंदि अर बासी भुज्जि … - [गढ़वाली भाषा के हित के लिए व्यापक दृष्टि सर्वोपरी](https://bolpahadi.in/comprehensive-vision-is-paramount-for-the-welfare-of-garhwali-language/): नरेन्द्र कठैत // अक्सर सुनने में आता है कि हम हिंदी भाषा के आचार व्यवहार में तालव्य ‘श’ का उच्चारण सही नहीं कर पाते। तालव्य ‘श’ के स्थान पर दन्त ‘स’ उच्चारित करते हैं। देश को देस, प्रदेश को प्रदेस, आकाशवाणी को आकासवाणी इत्यादि हमारे श्रीमुख से आम बोलचाल में निकल ही जाते हैं। इसके पीछे एकमात्र कारण यही है कि गढ़वाली लोक व्यवहार में तालव्य ‘श’ नहीं है। क्योंकि गढ़वाली भाषा अभी तक ठेट गांव या यूं कहें देहात की ही भाषा रही है अतः हमारी हिंदी पर भी उसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। इसमें अतिरंजन या मनोरंजन का … - [तय करो किस ओर हो तुम](https://bolpahadi.in/decide-which-side-you-are-on/): बल्ली सिंह चीमा // तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो ।। ख़ुद को पसीने में भिगोना ही नहीं है ज़िन्दगी,रेंग कर मर-मर कर जीना ही नहीं है ज़िन्दगी,कुछ करो कि ज़िन्दगी की डोर न कमज़ोर हो ।तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।। खोलो आँखें फँस न जाना तुम सुनहरे जाल में,भेड़िए भी घूमते हैं आदमी की खाल में,ज़िन्दगी का गीत हो या मौत का कोई शोर हो ।तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।। सूट … - [तमsलि़ उंद गंगा: सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज़](https://bolpahadi.in/tamsli-und-ganga-document-of-cultural-heritage/): आशीष सुंदरियाल // आज के समय में जब हमें ‘अबेर’ नहीं होती बल्कि हम ‘late’ हो रहे होते हैं, हम ‘जग्वाल़’ नहीं करते ‘wait’ करते हैं, हमें ‘खुद’ नहीं लगती हम ‘miss’ करते हैं – ऐसे समय में एक गढ़-साहित्य एवं मातृभाषा प्रेमी अपने अथक प्रयासों से लगभग 1000 पृष्ठों का एक बृहद गढ़वाली़ भाषा शब्दकोश तैयार करता है तो एक सुखद अनुभूति होती है। साथ ही इस बात का भी विश्वास होता है कि जब तक समाज में इस तरह के भाषानुरागी हैं तब तक हमारा लोक व लोक की ‘पच्छ्याण’  (identity) -हमारी भाषा जीवित रहेगी। गढ़वाली़ भाषा के … - [मजबूत इच्छाशक्ति से मिला ‘महेशानन्द को मुकाम](https://bolpahadi.in/maheshanand-got-his-position-due-to-strong-will-power/): ‘गांव में डड्वार मांगने गई मेरी मां जब घर वापस आई तो उसकी आखें आसूओं से ड़बडबाई हुई और हाथ खाली थे। मैं समझ गया कि आज भी निपट ’मरसा का झोल’ ही सपोड़ना पड़ेगा।… गांव में शिल्पकार-सर्वण सभी गरीब थे इसलिए गरीबी नहीं सामाजिक भेदभाव मेरे मन-मस्तिष्क को परेशान करते थे।… मैं समझ चुका था कि अच्छी पढ़ाई हासिल करके ही इस सामाजिक अपमान को सम्मान में बदला जा सकता है। पर उस काल में भरपेट भोजन नसीब नहीं था तब अच्छी पढ़ाई की मैं कल्पना ही कर सकता था। पर मैंने अपना मन दृड किया और संकल्प लिया … - [पहाड़ के लोकजीवन में रची बसी रोपणी](https://bolpahadi.in/plantation-established-in-mountain-folk-life/): संजय चौहान //            पहाड़ के लोकजीवन मे अषाड़ महीने का सदियों से गहरा नाता रहा है। अषाड़ का महीना पहाड़ में धान की रोपाई अर्थात रोपणी लगाने का महीना होता है। रोपणी और पहाड़ एक दूसरे के पूरक हैं। रोपणी पहाड़ के लोकजीवन मे इस तरह से रची बसी है कि आज भी रोपणी बरबस ही लोगों के मन को बेहद भाती है। अषाड महीने का आगमन मानसून आने का भी सूचक माना जाता है। क्योंकि पहाड़ की खेती पूरी तरह से मौसम पर निर्भर होती है और जब बारिश आयेगी तभी रोपणी लगती है। … - [देवदार](https://bolpahadi.in/devdar/): अनिल कार्की // मेरे पासअन्नत की यात्राएं नहींन ही यात्राओं केदस्तावेज मैं देवदार हूँमनिप्लाँट होनामेरे बस में नहीं इतिहास परमेरा कोई दावा नहींउन कुर्सीयों पर भी नहींजिन्हें बनाते हुएमुझे बढ़ई नेबीस जगहों परजोड़ा तोड़ा जोड़ तोड़ सेमेरा वास्ता नहीं मैं अब भीपहाड़ की किसी धार परतुम्हारे लिए चिर प्रतिक्षारत हूँओ प्रेमी युगलो !तुम आनामेरे तने को खुरच केलिख जाना अपना नामलेकर तने का सहाराचूम जाना एक दूसरे को सबसे तेज धूपसबसे तेज बारिसबर्फीली आंधियों मेंपहाड़ की पीठ परमै तुम्हारे प्रेम को बचाये रखूँगासम्भाले रखूँगातुम्हारे चुम्भन तुम लौटनाशताब्दियों बादतमाम यात्राओं सेले जाना मुझसे वापसअपना यौवनमैं खड़ा रहूँगातुम्हारी बाट जोहूँगा। - [गढ़वाळि भाषा मानकीकरण पर तीन दिनै कार्यशाला](https://bolpahadi.in/three-day-workshop-on-garhwali-language-standardization/): रमाकान्त बेंजवाल // दून यूनिवर्सिटी, देहरादून मा तीन दिनै (20 जून बिटि 22 जून, 2019 तलक) गढ़वाळि भाषा औच्चारणिक फरक तैं एकसौंडाळ कन्ना वास्ता कार्यशाला ह्वे।  यीं कार्यशाला मा उत्तराखण्डा  35 लिख्वार, साहित्यकार अर भाषा जणगुरोंन भाग ल्हीनि। डॉ. जयंती प्रसाद नौटियाल जीन भाषौ मानक रूप तय कन्न से पैलि कुछ मार्गदर्शी सिद्वान्त निश्चय कन्नै बात करि अर वे हिसाब से वूंन बतायि कि- 1. जन हिंदी मा मेरठा आसपासै खड़ि बोलि तैं आधार बणाये गे वनि गढ़वाळि मा सिरनगर्या गढ़वाळि तैं आधार बणौला। गढ़वाळ्या सबि इलाक्वा शब्द पर्यायवाची बण्या रौला। गढ़वाळी मूल प्रकृति खुणि बचौणा वास्ता सांस्कृतिक शब्दावलि तैं … - [गढ़वाळि भाषा और साहित्य की विकास यात्रा](https://bolpahadi.in/development-journey-of-garhwali-language-and-literature/): पुस्तक समीक्षा /  समीक्षक- डॉ. अचलानन्द जखमोला // अप्रितम अभिव्यंजना शक्ति, प्रभावोत्पादकता, संप्रेषणीयता, गूढ़ अर्थवता तथा अनेकार्थता को व्यक्त करने की अद्भुद क्षमता वाली गढ़वाली भाषा पुराकाल से ही अनेक विद्वतजनों के आकर्षण का केन्द्र बनी रही। सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘काव्य मीमांसा’ के रचयिता कश्मीर निवासी आचार्य राजशेखर ने गढ़वाल क्षेत्र के भ्रमण के दौरान यहां के निवासियों को ‘सानुनासिक भाषिणः’ तथा यहां की बोलियों में कृदन्तों का प्राधान्य देखते हुए इन्हें ‘कृतप्रिया उदीच्या’ घोषित किया था। इस भाषा की महत्ता को महापंडित राहुल सांकृत्यायन् तथा शीर्षस्थ भाषाविज्ञों यथा- डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. उदय नारायण तिवारी, डॉ. हरदेव बाहरी, डॉ. भोलाशंकर … - [शिकैत](https://bolpahadi.in/complaint/): धनेश कोठारी// जिंदगी! तू हमेसा समझाणी रै मि बिंगणु बि रौं/ पर माणि कबि नि छौं जिंदगी! तिन सदानि दिखै उकाळ अर उन्दार/पर मि उकळि कबि नि छौं जिंदगी! तेरा डेरा ऐन उजाळु- अन्ध्यारु बि/ पर मैं किवाड़ नि खोलि सक्यों जिंदगी! बग्त, गर्म्ल हक्क ह्वे बर्खान् भीजि ह्युंदिन् अळे बि छ/ पर तीन्दू कबि सुखै नि सक्यों जिंदगी! तेरु घैणु दगड़ू आज बि दगड़ा छ/ पर मैं गौळा कबि भ्यंटे नि सक्यों जिंदगी! सैंदिष्ट छन तेरा बाटा घाटा तेरु बि क्य कसूर/ जब मैं ई कबि हिटी नि छौं …। ©धनेश कोठारी 16 जुलाई 2019 ऋषिकेश, उत्तराखंड - [दानै बाछरै कि दंतपाटी नि गणेंदन्](https://bolpahadi.in/danai-bachrai-ki-dantpatni-ni-ganendan/):   ललित मोहन रयाल //   ऊंकू बामण बिर्तिकु काम छाई। कौ-कारज, ब्यौ-बरात, तिरैं-सराद मा खूब दान मिल्दु छाई। बामण भारि लद्दु-गद्दु बोकिक घौर लौटद छा। खटुलि, धोती, आटू, चौंळ, छतुरू। पैंसा दीण म नन्नी मोर जांदि छै। बरतण्या सामान जादातर निकमु निकळ जांदू छाई। बणिया बि पाल्टी तै सिकौंदू-भकलौंदु रैंदु छाई- “दानौ त चयेंदु, ऊ ना, यु वाळु ल्हिजावा, सस्तु-मस्तु लगै द्योलु।“ त ऊंक घौर मु खटुलु-बिस्तर, भांडी-कूंड्यों कु ध्यौ लग्यूं रौंदु छाई। जादाई कट्ठि ह्वैजांदु छाई। पंच-भांडि, छतरु-जुत्तौंन त ट्रंक क ट्रंक भर्यां रौंदा छा। हां, नर्यूल़ जरूर ऑर्जिनल होंद छा। किलैकि ऊ फैकर्ट्यों मा नि बण सकदि छा। … - [धुंआ-धुंआ (गढ़वाली कविता)](https://bolpahadi.in/dhuna-dhuna-garhwali-poem/): प्रदीप रावत ‘खुदेड़’// डांडी-कांठी, डाळी-बोटी धुंआ व्हेगेन पाड़ मा, मनखि, नेता, कवि, उड़ी तै रुवां व्हेगेन पाड़ मा। देहरादून बटि फुकेंदा बोणू कू हाल लिखेणू छ, अब त गौं का पत्रकार भी हवा व्हेगेन पाड़ मा। पहरेदार फसोरी सिया छन एसी हवा मा तख, हैरि चांठी जोळी इख उलटू तवा व्हेगेन पाड़ मा। कोयल बिचैरी देहरादून स्टूडियो मा गीत गाणी डांडयूं मा छक्वे बेसुरा कव्वा व्हेगेन पाड़ मा। कैते यूं फुकेंदी डांडयूं से कुछ बी मतलब नि, नेता अप्सर सब रुप्या खवा व्हेगेन पाड़ मा। पाणी बुसग्या, गंगा, नायर-गाड, सब बुसग्येन खाळ, पंदेरा, मगेरा, सुख्या कुवां व्हेगेन पाड़ मा। सब … - [अथश्री प्रयाग कथाः सिविल सेवा परीक्षा के प्रतियोगियों पर रोचक उपन्यास](https://bolpahadi.in/athashree-prayag-katha-interesting-novel-on-civil-services-examination-contestants/): – गंभीर सिंह पालनी// प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे युवाओं को लेकर हिन्दी में लिखे गए उपन्यासों ‘डार्क हॉर्स’ (लेखकः नीलोत्पल मृणाल) तथा ‘अल्पाहारी गृहत्यागी’ (लेखकः प्रचंड प्रवीर) की सूची में हाल ही में एक और नये उपन्यास का नाम जुड़ गया है; यह उपन्यास है श्री ललित मोहन रयाल का नया उपन्यास ‘अथश्री प्रयाग कथा ’। जहां एक ओर ‘अल्पाहारी गृहत्यागी’ उपन्यास में आई.आई.टी. की प्रवेश-परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों की दुनिया का चित्रण है तो ‘डार्क हॉर्स’ उपन्यास शानो-शौकत वाली नौकरी आई.ए.एस. की अभिलाषा लिये प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे ग्रेजुएट/पोस्ट ग्रेजुएट युवाओं की ज़िंदगी … - [राजशाही को हम आज भी ढो रहे](https://bolpahadi.in/we-still-carry-the-monarchy/): (डॉ. अरुण कुकसाल)/ ’हे चक्रधर, मुझे मत मार, घर पर मेरी इकत्या भैंस है जो मुझे ही दुहने देती है। हे चक्रधर, मुझे मत मार, घर पर मेरे बूढ़े पिता हैं। तू कितना निर्दयी है चक्रधर जो हमारी प्रार्थना को भी अनुसुना कर रहा है। चक्रधर, तेरी गोली से कोई सामने मर कर गिर रहा है तो बहुत से जान बचाने के लिए युमुना नदी में कूद रहे हैं।’ तिलाड़ी विद्रोह पर आधारित लोकगीत का भावानुवाद। तिलाड़ी विद्रोह (30 मई,1930) की 89वीं पुण्यतिथि पर यमुना के उन 100 से अधिक बागी बेटों को नमन और सलाम जिन्होंने अपने समाज के … - [‘खुद’ अर ‘खैरि’ की डैअरि (diary)](https://bolpahadi.in/diary-of-khud-and-khairi/): समीक्षक -आशीष सुन्दरियाल /  संसार की कै भि बोली-भाषा का साहित्य की सबसे बड़ी सामर्थ्य होंद वेकी संप्रेषणता अर साहित्य की संप्रेषणता को सबसे बड़ो कारण होंद वे साहित्य मा संचारित होण विळ संवेदना, प्रकट होण वळा भाव। अर भाव एवं भावोनुभूति की शब्दों का माध्यम से अभिव्यक्ति से रचना होंद कविता की। या फिर इनो भि ब्वले सकेंद कि कविता तैं जन्म देंद ‘भाव’, वो भाव जो जन्म ल्हेंदी ‘मन’ मा, जै खुणि गढविळ मा ब्वलदां हम ‘ज्यू’। ‘ज्यू त ब्वनू च’ कविता संग्रह मा भी हम तैं कवि अनूप रावत का ज्यू याने मन मा जन्म ल्हेंदा भाव … - [कही पे आग कहीं पे नदी बहा के चलो](https://bolpahadi.in/lets-go-somewhere-with-fire-and-somewhere-with-flowing-river/): जनकवि- डॉ. अतुल शर्मा// गांव-गांव में नई किताब लेके चलोकहीं पे आग कहीं पे नदी बहा के चलो। हर आंख में सवाल चीखता रहेगा क्याजवाब घाटियों में बंद अब रहेगा क्यागांव-गांव में अब पैर को जमा के चलोकहीं पे आग कहीं पे नदी बहा के चलो। भ्रष्ट अन्धकार का समुद्र आयेगासूर्य झोपड़ी के द्वार पहुंच जायेगाआंधियों के घरों में भी जरा जा के चलोकही पे आग कहीं पे नदी बहा के चलो। तेरी जुबान का सागर तो आज बोलेगाये गांव के गली के राज सभी खोलेगादिलों की वादियों में गीत का एक बहा के चलोकहीं पे आग कहीं पे नदी … - [‘काफल’ नहीं खाया तो क्या खाया?](https://bolpahadi.in/what-did-you-eat-if-you-did-not-eat-kafal-what-did-you-eat-if-you-did-not-eat-kafal/): ‘काफल’ (वैज्ञानिक नाम- मिरिका एस्कुलेंटा – myrica esculat) एक लोकप्रिय पहाड़ी फल है। इस फल में अनेकों पौस्टिक आहार छिपे होते है। खनिज लवणों से भरपूर यह फल मानव जीवन से जुड़ा हुआ है। काफल दुनियां का अकेला फल है जिस पर 9 महीने के फूल (बौर) आने के बाद फल लगते है। उत्तरी भारत के पर्वतीय क्षेत्रों (उत्तराखंड, हिमाचल) और नेपाल के हिमालयी तलहटी क्षेत्र में पाया जाने वाला एक वृक्ष है। जो कि सदाबहार होता है, काफल का फल चैत्रमाह में लगता है। काफल पर फूल जेठ माह में आ जाते हैं। काफल के पेड़ पर फल खत्म … - [नक्षत्र वेधशाला को विकसित करने की जरूरत](https://bolpahadi.in/need-to-develop-constellation-observatory/): सन् 1946 में शोधार्थियों और खगोलशास्त्र के जिज्ञासुओं के लिए आचार्य चक्रधर जोशी जी द्वारा दिव्य तीर्थ देवप्रयाग में स्थापित नक्षत्र वेधशाला ज्योतिर्विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भेंट है। आचार्य चक्रधर जोशी जी ने भूतपूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्री गणेश मावलंकर की प्रेरणा से सन् 1946 में नक्षत्र वेधशाला की नींव डाली थी। ताकि यहां ग्रह नक्षत्रों का अध्ययन करके लोग लाभ ले सकें। साथ ही उन्होंने बड़े परिश्रम से भारत के कोने-कोने में भ्रमण करके अनेक ग्रन्थ, पांडुलिपियां और महत्वपूर्ण पुस्तकें संग्रहित की। जिसके चलते नक्षत्र वेधशाला अपने अनूठे संग्रह के कारण क्षेत्रीय और देशी-विदेशी सैलानियों के आकर्षण का … - [अतीत की यादों को सहेजता दस्तावेज](https://bolpahadi.in/document-preserving-memories-of-the-past/): – संस्मरणात्मक लेखों का संग्रह ‘स्मृतियों के द्वार’ – रेखा शर्मा ‘गांव तक सड़क क्या आई कि वह आपको भी शहर ले गई।’ यह बात दर्ज हुई है हाल ही में प्रकाशित संस्मरणात्मक लेखों के संग्रह ‘ स्मृतियों के द्वार’ द्वार में। प्रबोध उनियाल ने अपने संपादकीय में लिखा कि- ‘स्मृतियों के द्वार’ एक पड़ताल है या कह लीजिए कि आपके गांव की एक डायरी भी। संग्रह में शामिल लेखक मानवीय संवदेनाओं के प्रति सचेत हैं। वह अतीत में लौटकर अपनी संस्कृति, विरासत, घर, समाज, रिश्ते-नाते, पर्यावरण, जल, जंगल जमीन आदि को अपने लेखों में सहेजते हैं। डॉ. शिवप्रसाद जोशी के … - [मेरि ब्वै खुणै नि आइ मदर्स डे (गढ़वाली कविता)](https://bolpahadi.in/meri-bhai-khunai-ni-aai-mothers-day-garhwali-poem/): पयाश पोखड़ा // मेरि तींदि गद्यलि निवताणा मा, मेरि गत्यूड़ि की तैण रसकाणा मा, लप्वड़्यां सलदरास उखळजाणा मा, मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे || सर्या राति मेरि पीठ थमथ्याणा मा, मि सिवळणा को बेमाता बुलाणा मा, सिर्वणा दाथि कण्डळि लुकाणा मा, मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे || बिसगीं दूदी फर ल्वै चुसाणा मा, पैनी हडक्यूं की माळा बिनाणा मा, अफु रुंदा रुंदा भि मी बुथ्याणा मा, मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे || तातु पाणि परतिम स्यळाणा मा, फेरि मनतता पाणिम नवाणा मा, बाढ़ ज्वनि, बाढ़ बाढ़ करणा मा, मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स … ## Pages - 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