हिन्दी-कविता

हां.. तुम जीत जाओगे

हां.. 

निश्चित ही
तुम जीत जाओगे
क्योंकि तुम जानते हो
जीतने का फन
साम, दाम, दंड, भेद

तुम्हें
सिर्फ जीत चाहिए
एक अदद कुर्सी के लिए
जिसके जरिए
साधे जाएंगे फिर वही
साम, दाम, दंड, भेद

जो
महत्वाकांक्षा रही है तुम्हांरी
घुटनों के बल उठने के दिन से
अब
दौड़ने लगे हो तुम, पूरे
साम, दाम, दंड, भेद के साथ

मगर, आखिरी सवाल कि
क्यान यह
साम, दाम, दंड, भेद
केवल तुम्हारा अपने लिए होगा
या कि
उनके लिए भी, जो
तुम्हारी जीत में सहभागी बनेंगे
बरगलाए जाने के बाद…
कापीराइट- धनेश कोठारी

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