लोकभाषा के एक भयंकर लिख्वाड़ कवि (व्यंग्य)
ललित मोहन रयाल // लोकभाषा में उनका उपनाम ’चाखलू’ था, तो देवनागरी में ’पखेरू’। दोनों नाम समानार्थी बताए जाते थे।…
Read More »फेसबुक अकौंट औफ ब्वाडा … (व्यंग्य)
यस. के थपल्याल ’घंजीर’ / / हे वै निरबै दलेदरा! निगुसैंकरा तु मेरू फीसबुक अकौंट किलै नि खोलणु छै रै……
Read More »‘जानलेवा’ कवि (व्यंग्य)
ललित मोहन रयाल // ‘जानलेवा’ उनका तखल्लुस था, ओरिजिनल नाम में जाने की, कभी किसी ने जरूरत ही नहीं समझी।…
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हिन्दी-कविता

बल हमारे गांव में
चंदन नेगी// बैठकों में हल टंगे हैं.. बल हमारे गांव मेंअब नेताओं के मजे हैं.. बल हमारे गांव में एक…
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आलेख

गढ़वाली-कुमाउंनी फिल्मों के लिए विश्व सिनेमा की प्रासंगिकता
प्रसिद्ध डौक्युमेंट्री रचनाधर्मी पॉल रोथा का सन 1930 में कहा थां जो आज भी तर्कसंगत है कि सिनेमा कला और…
Read More » पीले पत्ते
प्रबोध उनियाल // पतझड़ की मार झेल रहेअपने आंगन मेंनीम के पेड़ के पत्तों कोपीला होते हुए देख रहा हूं-…
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संस्कृति

जब दहकते अंगारो के बीच नाचते हैं जाख देवता
रूद्रप्रयाग जनपद के गुप्तकाशी क्षेत्र के अन्तर्गत देवशाल गांव में चौदह गांवों के मध्य स्थापित जाखराजा मंदिर में प्रतिवर्ष बैशाख…
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इंटरव्यू

उत्तराखंड में भी फिल्म पत्रकारिता जरूरीः मदन डुकलाण
(गढ़वाली-कुमांउनी फिल्म समीक्षा ने अभी कोई विशेष रूप अख्तियार नहीं किया है। इस विषय पर गढ़वाली साहित्यकार, संपादक, नाट्यकर्मी, अभिनेता…
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इंटरव्यू

गढ़वाली फिल्मों में हिंदी फिल्मों की भौंडी नकलः नरेंद्र सिंह नेगी
(प्रख्यात लोकगायक/साहित्यकार श्री नरेंद्र सिंह नेगी से फोन पर साहित्यकार श्री भीष्म कुकरेती की बातचीत) भीष्म कुकरेती – नेगीजी…
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आजकल

सिर्फ ‘निजाम’ दर ‘निजाम’ बदलने को बना उत्तराखंड?
धनेश कोठारी/ युवा उत्तराखंड के सामने साढे़ 17 बरस बाद भी चुनौतियां अपनी जगह हैं। स्थापना के दिन से ही…
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