दानै बाछरै कि दंतपाटी नि गणेंदन्
ललित मोहन रयाल // ऊंकू बामण बिर्तिकु काम छाई। कौ-कारज, ब्यौ-बरात, तिरैं-सराद मा खूब दान मिल्दु छाई। बामण भारि…
Read More »धुंआ-धुंआ (गढ़वाली कविता)
प्रदीप रावत ‘खुदेड़’// डांडी-कांठी, डाळी-बोटी धुंआ व्हेगेन पाड़ मा, मनखि, नेता, कवि, उड़ी तै रुवां व्हेगेन पाड़ मा। देहरादून बटि…
Read More »अथश्री प्रयाग कथाः सिविल सेवा परीक्षा के प्रतियोगियों पर रोचक उपन्यास
– गंभीर सिंह पालनी// प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे युवाओं को लेकर हिन्दी में लिखे गए उपन्यासों ‘डार्क हॉर्स’…
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गेस्ट-कॉर्नर

राजशाही को हम आज भी ढो रहे
(डॉ. अरुण कुकसाल)/ ’हे चक्रधर, मुझे मत मार, घर पर मेरी इकत्या भैंस है जो मुझे ही दुहने देती है।…
Read More » ‘खुद’ अर ‘खैरि’ की डैअरि (diary)
समीक्षक -आशीष सुन्दरियाल / संसार की कै भि बोली-भाषा का साहित्य की सबसे बड़ी सामर्थ्य होंद वेकी संप्रेषणता अर साहित्य…
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हिन्दी-कविता

कही पे आग कहीं पे नदी बहा के चलो
जनकवि- डॉ. अतुल शर्मा// गांव-गांव में नई किताब लेके चलोकहीं पे आग कहीं पे नदी बहा के चलो। हर आंख…
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आलेख

‘काफल’ नहीं खाया तो क्या खाया?
‘काफल’ (वैज्ञानिक नाम- मिरिका एस्कुलेंटा – myrica esculat) एक लोकप्रिय पहाड़ी फल है। इस फल में अनेकों पौस्टिक आहार छिपे…
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आलेख

नक्षत्र वेधशाला को विकसित करने की जरूरत
सन् 1946 में शोधार्थियों और खगोलशास्त्र के जिज्ञासुओं के लिए आचार्य चक्रधर जोशी जी द्वारा दिव्य तीर्थ देवप्रयाग में स्थापित…
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साहित्य

अतीत की यादों को सहेजता दस्तावेज
– संस्मरणात्मक लेखों का संग्रह ‘स्मृतियों के द्वार’ – रेखा शर्मा ‘गांव तक सड़क क्या आई कि वह आपको भी…
Read More » मेरि ब्वै खुणै नि आइ मदर्स डे (गढ़वाली कविता)
पयाश पोखड़ा // मेरि तींदि गद्यलि निवताणा मा, मेरि गत्यूड़ि की तैण रसकाणा मा, लप्वड़्यां सलदरास उखळजाणा मा, मेरि ब्वै…
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