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साहित्य

अतीत की यादों को सहेजता दस्तावेज
– संस्मरणात्मक लेखों का संग्रह ‘स्मृतियों के द्वार’ – रेखा शर्मा ‘गांव तक सड़क क्या आई कि वह आपको भी…
Read More » मेरि ब्वै खुणै नि आइ मदर्स डे (गढ़वाली कविता)
पयाश पोखड़ा // मेरि तींदि गद्यलि निवताणा मा, मेरि गत्यूड़ि की तैण रसकाणा मा, लप्वड़्यां सलदरास उखळजाणा मा, मेरि ब्वै…
Read More »लोकभाषा के एक भयंकर लिख्वाड़ कवि (व्यंग्य)
ललित मोहन रयाल // लोकभाषा में उनका उपनाम ’चाखलू’ था, तो देवनागरी में ’पखेरू’। दोनों नाम समानार्थी बताए जाते थे।…
Read More »फेसबुक अकौंट औफ ब्वाडा … (व्यंग्य)
यस. के थपल्याल ’घंजीर’ / / हे वै निरबै दलेदरा! निगुसैंकरा तु मेरू फीसबुक अकौंट किलै नि खोलणु छै रै……
Read More »‘जानलेवा’ कवि (व्यंग्य)
ललित मोहन रयाल // ‘जानलेवा’ उनका तखल्लुस था, ओरिजिनल नाम में जाने की, कभी किसी ने जरूरत ही नहीं समझी।…
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हिन्दी-कविता

बल हमारे गांव में
चंदन नेगी// बैठकों में हल टंगे हैं.. बल हमारे गांव मेंअब नेताओं के मजे हैं.. बल हमारे गांव में एक…
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आलेख

गढ़वाली-कुमाउंनी फिल्मों के लिए विश्व सिनेमा की प्रासंगिकता
प्रसिद्ध डौक्युमेंट्री रचनाधर्मी पॉल रोथा का सन 1930 में कहा थां जो आज भी तर्कसंगत है कि सिनेमा कला और…
Read More » पीले पत्ते
प्रबोध उनियाल // पतझड़ की मार झेल रहेअपने आंगन मेंनीम के पेड़ के पत्तों कोपीला होते हुए देख रहा हूं-…
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संस्कृति

जब दहकते अंगारो के बीच नाचते हैं जाख देवता
रूद्रप्रयाग जनपद के गुप्तकाशी क्षेत्र के अन्तर्गत देवशाल गांव में चौदह गांवों के मध्य स्थापित जाखराजा मंदिर में प्रतिवर्ष बैशाख…
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इंटरव्यू

उत्तराखंड में भी फिल्म पत्रकारिता जरूरीः मदन डुकलाण
(गढ़वाली-कुमांउनी फिल्म समीक्षा ने अभी कोई विशेष रूप अख्तियार नहीं किया है। इस विषय पर गढ़वाली साहित्यकार, संपादक, नाट्यकर्मी, अभिनेता…
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